,

प्रेरणादायक: रिक्शा चालक ने नौ स्कूल खोलकर छेड़ी अशिक्षा के खिलाफ जंग

सुनने में भले ही असंभव लगे कि एक रिक्शा चालक जिसकी कमाई अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए भी पर्याप्त नहीं, वह एक के बाद एक कर नौ स्कूल कैसे खोल सकता है। लेकिन इस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया है असम के करीमगंज जिले के मधुरबोंद गांव के एक साधारण से रिक्शा चालक, अहमद अली ने। गरीबी के कारण शिक्षा से वंचित हो जाने का दुख मन में लिए एक ऐसे सपने की कल्पना अहमद ने की जिसे पूरा करने का बीड़ा भी उठाया। इस सपने को पूरा करने की ओर एक कदम जब बढ़ाया तो अनगिनत हाथ सहयोग के मिलते चले गए और इस सपने ने ऐसा आकार लिया कि सिर्फ एक नहीं नौ स्कूल खोल दिए। इतना ही नहीं अहमद अली अब एक कॉलेज भी खोलना चाहते हैं।

गरीबी और अशिक्षा एक दूसरे के पूरक हैं

बचपन से गरीबी में पले अहमद अली को पेट पालने के कारण पढ़ाई छोड़नी पड़ी। आज भी अहमद रिक्शा चलाकर मुश्किल से परिवार का पेट पालते हैं। ऐसे में स्कूल खोलने का सपना कोरी कल्पना ही लगने लगा था। लेकिन हिम्मत और इरादों ने रास्ते बंद नहीं होने दिए। 1978 में उन्होंने अपने गांव की जमीन बेचकर और कुछ लोगों की मदद से पहला स्कूल खोल ही दिया। गांव के बच्चों के लिए यह स्कूल मात्र आशा की किरण नहीं एक नई सुबह की शुरुआत थी।

स्‍वयं की अशिक्षा को ही स्‍कूल खोलने के लक्ष्‍य का आधार बना लिया

अहमद अली को अब आस-पास के गांव के बच्चों के लिए भी स्कूल की जरूरत महसूस होने लगी। स्कूल खोलने का लक्ष्य लेकर गांव वालों से अहमद ने बात की तो एक के बाद एक उन्हें सफलता मिलती चली गई और नौ स्‍कूल भी खुल गए। चुनौतियां तो रास्ते में बहुत आईं लेकिन सरकारी सहायता और भले लोगों के साथ से अहमद आगे बढ़ते चले गए। इन स्कूलों में से 3 स्कूलों को सरकारी मान्यता प्राप्त हो चुकी है जबकि दूसरे स्कूल इस प्रक्रिया को शीघ्र ही पूरा कर लेंगे। अशिक्षित होने के कारण अहमद के मन में जो टीस थी वह इन स्कूलों से पढ़कर निकल रहे बच्चों को देख कर खुशी में बदल जाती है। इन नौ स्कूलों में से मात्र एक स्कूल का नामकरण गांव वालों की ज़िद के कारण अहमद के नाम पर हुआ जो प्रमाण है इस बात का कि अहमद के जीवन के इस लक्ष्य में नाम और शोहरत की मिलावट नहीं है।

लगन और मेहनत यदि सच्‍ची हो तो सफलता चलकर आती है

अहमद के सपने को गति मिलने में बेशक कई वर्षों का समय लगा लेकिन शिक्षा के खिलाफ जो जंग उन्होंने छेड़ी थी उसमें शत-प्रतिशत सफलता उन्हें मिली है। इसका साक्षात प्रमाण है इलाके के विधायक द्वारा सरकारी योजना के अंतर्गत अहमद हाई स्कूल के लिए 11 लाख रुपए की वित्तीय मदद की घोषणा करना। अपनी आखिरी सांस तक अहमद रिक्शा खींचकर मेहनत करने से पीछे नहीं हटना चाहते साथ ही अपने इस सपने को विस्तृत रुप देना चाहते हैं।

हमें रूक कर सोचने की जरूरत है

शहरों के प्राइवेट स्कूलों में जहां शिक्षा आज माता-पिता के लिए एक महंगा उत्पाद बन चुकी है। ऐसे परिवेश में एक गरीब रिक्शा चालक द्वारा गरीब माता-पिता के बच्‍चों के लिए 9 स्कूलों का खोलना और कॉलेज खोलने का सपना देखना एक प्रश्न चिन्ह लगाता है शहरी जीवन शैली पर कि हमें रुक कर गहराई से सोचने की जरूरत है। जो शिक्षा हमें जीवन के हर क्षेत्र में सक्षम बनाती है क्यों हम उस शिक्षा को महंगाई की ओर धकेल कर आम आदमी की पहुंच से दूर कर रहे हैं।

आप अपनी प्रतिक्रिया नीचे कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं और इस पोस्ट को शेयर अवश्य करें 

आपका कमेंट लिखें