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कैसे इंदौर के एक परिवार ने गैराज से शुरुआत कर 300 करोड़ टर्नओवर वाली कंपनी का किया निर्माण

बिज़नेस का निर्माण करना, छोटे से बच्चे के देखभाल करने जैसा होता है। इसके लिए धीरज, भागीदारी और निरंतर ध्यान रखने की जरुरत होती है। यदि आप असफल भी हो गए तब भी आप इससे हार नहीं मान सकते और अलग-अलग तरीकों से फिर से उसे खड़ा करने की कोशिश करते हैं। आज की कहानी एक ऐसे निडर व्यक्ति के बारे में है जिसने आधी दर्जन असफलताओं के बावजूद खुद से विश्वास खोने नहीं दिया। वे तब तक कोशिश करते रहे जब तक की उन्हें सफलता मिल नहीं गई और बाद में उन्होंने करोड़ों रूपये की विरासत बना ली।

प्रकाश अग्रवाल के जीवन का अधिकतम समय मध्यप्रदेश के इंदौर में गुजरा। उन्होंने बचपन से अपने पिता को परिवार के खर्चों के लिए ज़द्दोजहद करते हुए ही देखा। उनके पिता स्वयं ही मोम और कैंडल बनाने के सांचे लेने दिल्ली जाते थे। शुरूआत में पैसे बनाने के लिए वे मजदूरों को भी नहीं रखते थे और स्वयं ही कैंडल बनाते थे और बाद में बेचने भी खुद जाते थे।

जब आर्थिक हालात में थोड़ा सुधार आया तब वे उत्पादन बढ़ाने के लिए मज़दूर रखने लगे। प्रकाश और उनके दो भाई स्कूल से लौटकर कैंडल बनाने में अपने पिता की मदद करते। प्रकाश ने अपनी जिम्मेदारियों को समझते हुए घर की आमदनी बढ़ाने के लिए अपने तरीके से सोचना शुरू किया।

उन्होंने तय किया कि वे एक कपड़े की दुकान में काम करेंगे। इसमें इस बात की गारंटी थी कि हर महीने एक नियमित राशि घर पहुंच जाती थी, लेकिन प्रकाश इससे संतुष्ट नहीं हुए। वे लगातार नये बिज़नेस आइडिया के बारे में सोचते रहे और वे जल्द ही खुद का कुछ करना चाहते थे। वे कुछ सालों तक डिटर्जेंट पाउडर बनाने का बिज़नेस करने लगे। वह उस समय का फायदेमंद आइडिया था। परन्तु इस बिज़नेस में एक के बाद एक समस्या आने लगी और यह पूरी तरह से फ्लॉप हो गई। आने वाले कुछ समय तक उन्हें बार-बार असफलता का ही मुँह देखना पड़ा। लगभग सात-आठ बिज़नेस उन्होंने शुरू करने की कोशिश की परन्तु सभी में उन्हें नाक़ामयाबी ही मिली। उनके आस-पास के लोग तब उनकी काबिलियत पर सवाल उठाने लगे थे।  

1991 में एक पहचान के व्यक्ति ने उन्हें सुझाव दिया कि वे बैंगलोर स्थित किसी भी अगरबत्ती कम्पनी की फ्रेंचाइजी ले लें। प्रकाश स्पष्ट थे कि वे जो सोच रहे थे वह यह नहीं है। उन्होंने कहा-

“कुछ समय रुक जाइये और आप देखेंगे की मेरी कंपनी की फ्रेंचाइजी के लिए लोग लाइन लगा कर खड़े होंगे। ”

प्रकाश के पास अब आशा का दामन पकड़ कर रखने और कोशिश करने के अलावा कोई रास्ता नहीं था। उन्होंने अपने आप को एक मौका और दिया और अगरबत्ती बनाने के बिज़नेस में कदम रखा। 1992 में एक मामूली पूंजी के साथ अपने गैराज में ही अपनी पत्नी के साथ मिलकर अगरबत्ती बनाने का काम शुरू किया। अगरबत्ती बिज़नेस में अधिकतर लोग ऐसा ब्रांड का नाम रखते हैं जो धर्म से या आध्यात्म से जुड़ा होता है पर प्रकाश ने अपने ब्रांड का नाम दिया जेड-ब्लैक।  बजाय फ्लावर-प्रिंट रैपिंग के, जेडब्लैक पूरे गहरे काले रंग के पैकेट के रूप में सामने आया।

अभी प्रकाश के बेटे अंकित अग्रवाल मैसूर दीप परफ्यूमरी हाउस के डायरेक्टर के पद पर हैं जो जेडब्लैक की पैरेंट कम्पनी है। गलाकाट प्रतिस्पर्धा के चलते और फिर आग में उनका अधिकतर इंफ्रास्ट्रक्चर जल कर खाक हो गया था।  जेड-ब्लैक ने न केवल इस मुश्किल के बाद खुद को संभाला बल्कि बाधाओं के बावजूद और निखर कर उभरा।

आज अगरबत्ती ब्रांड में जेडब्लैक भारत का दूसरा बड़ा ब्रांड है और लगभग दो करोड़ अगरबत्ती रोज बनाता है। लगभग पंद्रह देशों में उनके उत्पाद का निर्यात हो रहा है। उनका रेवेन्यू 300 करोड़ रुपयों का है। आज 3000 करोड़ के अगरबत्ती के बिज़नेस में उनकी हिस्सेदारी 10 से 15 % का है। उन्होंने अपने बिज़नेस को बढ़ाने के लिए एफमसीजी सेक्टर में भी कदम रखा है। इसमें वे खाने का तेल, मॉस्किटो कोइल, सोया चंक्स, मेहंदी आदि उत्पाद रखने वाले हैं।  इनकी कम्पनी में लगभग 1000 कर्मचारी हैं जिनमे 70% महिलाएं हैं। जेड-ब्लैक ने महेंद्र सिंह धोनी को अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाया है।

कई विफलताओं की ठोकर खाने के बाद, प्रकाश अग्रवाल फिर से विकसित हुए हैं। वे इंदौर में ही रहते हैं और अपने जैसे सैकड़ों लोगों के लिए संभावनाओं का निर्माण करते हैं। उनकी यह कहानी उदाहरण है धीरज, दृढ़ता और कठोर परिश्रम की। युवा भारत के लिए हमें प्रकाश जैसे ही लोगों की जरूरत है जो नौकरियों का सृजन करता हो, न कि सिर्फ अपने लिए नौकरी की तलाश में गुम रहे।

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