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उस IAS की कहानी जिन्होंने नेताओं द्वारा अवैध रूप से कब्ज़े किये गए जमीन को गरीबों में बांट दिया था

हमारे देश में प्रशासनिक अधिकारियों को बहुत ही सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। अक्सर यह कहा भी जाता है कि हमारे देश को राजनेता और प्रशासनिक अधिकारी मिलकर ही चलाते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश के विकास एवं प्रगति में इन अधिकारियों का विशेष योगदान होता है। हालाँकि जहाँ एक ओर इन अधिकारियों पर देश को गर्व होता है, वहीं एक ओर उनपर सवाल भी उठता रहा है, कहा जाता है कि नेताओं की जीहुजूरी करना इन प्रशासनिक अधिकारियों की मजबूरी बन जाती है। हालाँकि हमारे देश में कई ऐसे अधिकारी भी हैं, जिन्होंने इस मिथ को तोड़ने का काम किया है। और ऐसे एक नहीं, हमारे समाज में तमाम उदाहरण मिल जायेंगे जिन्होंने अन्याय के खिलाफ बेहद बुलंद आवाज़ उठायी।

ऐसा ही एक उदाहरण हमें पूर्व आईएएस अधिकारी हर्ष मंदर सिंह में मिलता है। हर्ष मंदर एक ऐसे प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने सत्ता के सामने कभी भी अपने घुटने नहीं टेके, फिर भले ही इसके लिए उन्हें अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा ही क्यों देना पड़ा हो। हर्ष एक ऐसे अधिकारी बन कर उभरे जिन्होंने अपनी सेवा के दौरान किसी राजनीतिक दबाव को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। हर्ष पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कार्यकाल में राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य थे। सेवाओं से निलंबित होने के बाद वे देश और विदेश के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में लेक्चर देने भी जाते हैं। अब वे सामाजिक कार्यकर्ता हैं और समाज में बराबरी लाने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। उनका मानना है कि हमें राजनीति को धर्म से दूर करना होगा तभी देश उन्नति के रास्तों पर सफल हो पाएगा। आइये उनके जीवन के बारे में विस्तार से पढ़ते हैं।

आईएएस बनते ही हटाया अपना उपनाम

1955 में जन्में हर्ष मंदर सिंह 1980 बैच के आईएएस अधिकारी हैं उनकी दूरगामी सोच का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्रशासनिक सेवा से जुड़ने के तुरंत बाद ही उन्होंने अपने नाम से अपना उपनामसिंहहटा लिया था। उनका मानना था कि उपनाम लगाने से वे किसी एक ख़ास जाति के रूप में पहचाने जाएंगे, और ऐसा हो सकता है कि अन्य जाति अथवा वर्ग से ताल्लुक रखने वाले लोग उनसे जुड़ पाएं। हर्ष मंदर करीब दो दशक तक आईएएस रहे। वे मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के अलगअलग हिस्सों में भी तैनात रहे हैं। प्रशासनिक अधिकारी के अपने कार्यकाल के दौरान वो तमाम तरह के पदों पर रहे, और उस दौरान अपने द्वारा किये गए नेक कार्यों के लिए वो काफी सुर्खियों में भी रहें। उन्होंने ऐसे कार्यों को भी अंजाम दिया जिसमें सरकार की कोई भागीदारी नहीं थी, लेकिन जनता की भलाई उन कार्यों में निहित थी। वो मानते हैं कि व्यक्ति को हर उस चीज़ का विरोध करना चाहिए जहाँ अन्याय हो रहा हो, फिर भले ही विरोधी कितना ताकतवर क्यों हो, आपके चुने रास्ते आपको जीत की ओर अवश्य ले जाते हैं।

अन्याय के खिलाफ उठाते रहे हैं कदम

हर्ष मंदर ने 1989 में नर्मदा बचाओ आंदोलन के दौरान मेधा पाटकर और बाबा आम्टे के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को रोकने से इंकार कर दिया था, जबकि उस दौरान इस आंदोलन को रोकने के आदेश सरकार द्वारा दिए गए थे। वहीं इसके अलावा उन्होंने वर्ष 1990 में मध्यप्रदेश के रायगढ़ जिले में एक ताक़तवर नेता की दो हजार एकड़ जमीन ग़रीबों में बांट दी थी, जो अवैध रूप से उस नेता के पास मौजूद थी। उनके कार्यकाल के दौरान उनका 22 से भी ज्यादा बार सत्ता पक्ष के द्वारा स्थानांतरण किया गया। अंत में उन्होंने अपने खिलाफ हो रहे इस अन्याय को लेकर आवाज़ उठाई, जिसका नतीजा उन्हें भुगतना भी पड़ा। हालाँकि वो अपने जीवन में हुए नकारात्मक अनुभवों को सीख के रूप में देखते हैं और यह मानते हैं कि जीवन में कितना भी अन्याय हो, व्यक्ति को हमेशा न्याय की उम्मीद बरक़रार रखनी चाहिए।  

अल्पसंख्यकों, दलितों की भी बने आवाज़

प्रशासनिक सेवाओं के साथ साथ वे लगातार अल्पसंख्यकों, दलितों की भी आवाज़ उठाते रहे हैं। नफरत के माहौल के खिलाफ उन्होंने अमन और चैन से जुड़े अभियान की भी शुरूआत की, जिसका नाम है, कारवांमोहब्बत। इस मुहिम की शुरुआत असम से हुई थी। वो यह मानते हैं कि शोषित वर्ग को मुख्य धारा में जोड़ना होगा जिसके जरिये देश प्रगति के रास्ते पर जा सकता है। उन्होंने इसके लिए हरसंभव प्रयास किये, जिससे जनता का जितना भला हो सके, वो हो। उन्होंने देश के विभिन्न स्थानों पर विभिन्न पदों पर आसीन रहते हुए देश की भिन्नताओं को व्यापक रूप से समझा और यह भी समझा कि समाज में सभी व्यक्तियों को बराबरी का अधिकार देना बेहद जरूरी है।

उनकी कहानी हमें यह प्रेरणा देती है कि भले ही हमारे आस-पास कितनी ही विपरीत परिस्थितियां क्यों जायें, हमें अपने धैर्य, आत्मबल एवं हौसले को बुलंद रखना चाहिए। यह अक्सर कहा जाता है कि जीवन फूलों का सेज नहीं है, और हमें अपने मुकाम तक की दूरी स्वयं तय करनी होती है। और अगर हर्ष मंदर की तरह हमारा मुकाम भी औरों की भलाई में खुद को समर्पित करना है तो उसके लिए हमें अथक प्रयास करने होंगे, जिसके लिए हमें तैयार रहना चाहिए। वो हम सबके लिए प्रेरणा का विषय हैं और हम ऐसी उम्मीद करते हैं कि उनके नेक कार्यों के बारे में पढ़कर हमें ज़रूर हौसला मिलेगा

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