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कद्दावर नेताओं के खिलाफ़ कदम उठाकर एक बड़े घोटाले का पर्दाफ़ाश करने वाले दबंग IAS ऑफिसर

ईमानदारी अपने आप में व्यक्तित्व का एक गहना होती है। पर आज के समय में ईमानदारी शब्द का उदाहरण बनने वाले लोग दुर्लभ हो गए हैं। आज बेईमानी और भ्रष्टाचार ने हमारे देश में गहरे स्तर तक पैठ बना लिया है। हालात इस कदर गंभीर हो चुके हैं कि अब भ्रष्टाचार हमारी व्यवस्था का हिस्सा बन चुका है। एक चपरासी से लेकर बड़े-बड़े मंत्रियों तक सब पर भ्रष्टाचार के छींटे नज़र आते हैं।

लेकिन बहुत कम लोग हैं जो इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं और अगर कोई व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान छेड़ता है तो उसे बहुत समस्याओं का सामना करना पड़ता है। वास्तव में यह अपने देश का दुर्भाग्य है कि यहां पर ईमानदार लोगों को न तो काम करने दिया जाता है और न ही चैन से जीने दिया जाता है। ईमानदारी किस चिडिय़ां का नाम है यह तो कम से कम अपने देश के मंत्री और नेताओं के साथ 90 प्रतिशत अफसरों को मालूम ही नहीं है। मालूम है भी है तो किसी को फर्क नहीं पड़ता, सब जानते हुए भी वे ईमानदारी से नाता जोडऩा ही नहीं चाहते हैं। बेईमानी की रोटी खाने की जिनकी आदत पड़ चुकी है वे भला कैसे ईमानदारों की कद्र कर सकते हैं।

एक तरफ जहां भ्रष्ट मंत्री और अफसर बेसुमार हैं तो दूसरी तरफ कुछ ईमानदार अफसर भी हैं जो अपनी ईमानदारी से एक मिसाल कायम करते हैं। उन्ही में एक हैं आईएएस ऑफिसर अमित खरे जिन्होंने देशभर में बिहार के चर्चित लगभग 950 करोड़ रुपए के चारा घोटाले का खुलासा कर आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजा।

1985 बैच के आईएएस ऑफिसर अमित की गिनती आज देश के सबसे प्रभावशाली प्रशासनिक ऑफिसर में होती है। खरे फिलहाल झारखंड में विकास अायुक्त के पद पर पदस्थापित हैं। लेकिन केंद्र सरकार ने उन्हें सूचना एवं प्रसारण सचिव बनाने का फैसला किया है। खरे ने करीब दो दशक तक बिहार व झारखंड सरकार के लिए काम किया है। अब जल्द ही उन्हें झारखंड सरकार द्वारा केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए रिलीव कर दिया जायेगा। वे एक जून से सूचना एवं प्रसारण विभाग के सचिव का पदभार ग्रहण करेंगे। वह इससे पहले राज्य सरकार के वित्त सचिव, राज्यपाल के प्रधान सचिव, वाणिज्यकर सचिव सहित कई अन्य महत्वपूर्ण पदों पर रह चुके हैं। अमित खरे वर्ष 2014 में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति से झारखंड सरकार की सेवा में लौटे थे। मार्च 2016 में उन्हें राज्य के मुख्य सचिव रैंक में प्रोन्नति मिली थी। उसके बाद 2017 में उन्हें केंद्र सरकार द्वारा सचिव रैंक के लिए इमपैनलमेंट किया गया था।

मूलतः महाराष्ट्र के नागपुर के रहने वाले अमित का जन्म 1961 में हुआ था। भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी के तौर पर उन्होंने 1886 में पदभर ग्रहण किया। बिहार कैडर चुनने के बाद उनकी पदस्थापना बिहार में हुई लेकिन झारखंड राज्य अलग होने पर झारखंड कैडर में चले गए। वे पूरे देश के मशहूर चारा घोटाला को उजागर करने की अपनी भूमिका के लिए बहुत प्रसिद्ध है। जिसमें बिहार के दो मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा और लालू प्रसाद यादव को सलाखों के पीछे भी रहना पड़ा। लगभग 950 करोड़ रुपए का चारा घोटाले आज भी कोर्ट में चल रहा है, आये दिन यह मामला मीडिया की सुर्खियाँ बना रहता है। फिलहाल उसी मामले में लालू प्रसाद जेल की सजा भी काट रहे हैं।

कद्दावर राजनेताओं के खिलाफ़ उठाया कड़ा कदम 

इसे खरे की दिलेरी ही कहा जाए जो उन्होंने बड़े-बड़े कद्दावर राजनेताओं के खिलाफ कड़ा कदम उठाने का माद्दा दिखाया। क्योंकि वह नब्बे के दशक का दौर था। और नब्बे का दौर मतलब लालू के एकक्षत्र दबदबा। बिहार में लालू प्रसाद प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापस लौटे थे। दिल्ली की सत्ता में भी उनकी भरपूर दावेदारी थी। उस वक्त मीडिया नें उन्होंने किंग मेकर का उपनाम दिया था। ऐसे में एक बाहुबली नेता से सीधे टकराना किसी भी ऑफिसर के लिए बड़ी हिम्मत और जिगर की बात थी।

जब नवंबर और दिसबंर 1995 में खरे को 10 करोड़ और 9 करोड़ रुपए निकासी की खबर मिली तो उन्हें शक हुआ। उन्हें लगा कि शायद किसी ने अपने पुराने बिल का क्लियरेंस लिया होगा। लेकिन उन्होंने पशुअधिकारियों को बुलाया और जांच करने का फैसला किया। जांच के बाद उन्हें पता चला कि पूरे चाईबासा के कोष से 37.7 करोड़ रुपए अवैध तरीके से निकाले जा चुके थे। जांच के दौरान यह घोटाला परत दर परत खुलता गया और उस दशक के सबसे बड़े घोटाले का पर्दाफाश हुआ।

बदले की कार्यवाही का हुए शिकार लेकिन हार नहीं मानी

चारा घोटाला सामने लाने के कारण अमित को नए तरीकों से प्रताड़ित और परेशान भी किया गया। बिहार सरकार को खरे का जांच करना रास नहीं आ रहा था तो उनका ट्रांसफऱ कर दिया गया। उस वक़्त अमित की पोस्टिंग ऐसी जगह कर दी गई थी, जहां उन्हें सैलरी ही नहीं मिलती थी। उसी दौरान खरे के लिए सबसे मुश्किल दौर भी आया। 1997 में जब उनके पिता जी बीमार चल रहे थे, अपने पिता के इलाज के लिए छ़ुट्टी मांगने गए पर कलेक्टर ने लीव भी नहीं दी। काफी प्रयत्नों के बाद खरे को छुट्टी मिली। मगर उनके घर पहुंचते ही उनकी छुट्टी खारिज कर दी गई। उन्हें वापस पटना तलब कर लिया गया और इसी बीच उनके पिता जी का निधन भी हो गया।

खरे की मुश्किलें तब जाकर कुछ कम हुईं जब अलग राज्य बनने के बाद वे झारखंड कैडर में चले गए। चारा घोटाले की जांच के दौरान उन पर लगातार दबाव और प्रताड़ना के बावजूद भी उन्होंने कभी हार नहीं मानी। वे कभी बईमानों के सामने नहीं झुके और ईमानदारी से समझौता नहीं किया।

खरे आज युवा आईएएस अधिकारियों के लिए एक उदाहरण स्वरूप हैं। उनकी कहानी सबको सीख देती है कि अपने कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन करें और गलत लोगों के सामने कभी हार नहीं मानें।

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