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परंपरागत खेती में थोड़ा बदलाव कर इस किसान ने अपनी सालाना कमाई को तीन गुणा से भी अधिक बढ़ाया

हर क्षेत्र में एक नये अवसर के बीज छिपे होते हैं जरुरत होती है वह पारखी नजर की जो उसे पहचान सके। नियमित खेती बाड़ी में जहाँ रबी और खरीफ की फसल के अलावे कुछ कृषक जहाँ व्यवसायिक फसल उपजा कर आय में संस्थागत स्रोतों के अतिरिक्त नयी कमाई का जरिया बना रहे हैं। वहीं एक किसान अपने फसल के साथ फूलों की खेती करके अपनी किसानी से होने वाले आय में कई गुणा वृद्धि कर ली।

फूल जो अपने आसपास के दृश्य को सुन्दर बनाता है वहीं इसकी खेती से अच्छी कमाई भी होती है। इस बात को भाँपने के बाद राँची, झारखण्ड के ओरमाँझी ब्लाॅक के सदमा निवासी श्री गंसु महतो ने अपनी प्रचलित खेती के संग फूलों की खेती पाॅलीहाऊस/ग्रीनहाउस की तकनीक से शुरु की। आज इन फूलों से इन्हें 15-20 लाख तक की कमाई हो जाती है।

विरासत में मिली खेती-बाड़ी को ही गंसु ने संभाला। परंपरागत खेती करते हुए गंसु एक सामान्य किसानी कर रहे थे। इसी दरम्यान उन्हें एक बार महाराष्ट्र जाने का अवसर मिला। वहाँ उन्होंने देखा कि वहाँ के किसान फसल के साथ कई और पैदावार करके अच्छी कमाई कर रहे हैं। झारखण्ड वापस लौट कर उन्होंने एग्रिकल्चर काॅलेजों, कृषि विज्ञान केन्द्रों के वैज्ञानिकों से सम्पर्क कर फूलों की खेती शुरु की।

अपने परंपरागत खेती के साथ कुछ और नये प्रयोग की चाहत और एक सामान्य आर्थिक लाभ में कुछ इजाफा करने का ख्याल जब गंसु महतो के मन में आया तो उन्होंने राँची स्थित बिरसा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से ट्रेनिंग लेकर इस क्षेत्र में नया प्रयोग किया। उन्होंने साक-सब्जी के साथ-साथ फूलों की भी खेती शुरु कर दी। इन फूलों में “जरबेरा” और “ग्लैडिलस” प्रमुख हैं। पाॅलिहाऊस/ग्रीनहाउस तकनीक के इस्तेमाल से उन्होंने दस से अधिक किस्मों के फूलों की खेती शुरू की। पहले जहाँ खेती से शुद्ध लाभ 5-6 लाख सालाना हुआ करता था वहीं आज शुद्ध लाभ में तीन गुणा से भी अधिक लगभग 15-20 लाख सालाना हो गया है।

राँची क्षेत्र को पहले इन फूँलों के लिए कोलकत्ता पर निर्भर रहना पड़ता था। ऐसे में गंसु महतो का यह प्रयास प्रदेश को आत्मनिर्भर बना रहा है। सीजन में जहाँ जरबेरा के एक फूल की किमत 5-8 रुपये होती है वहीं आॅफ सीजन में इसकी किमत 3-5 रुपये की होती है। हर बार (अल्टरनेट दिन पर) कम से कम चार से साढ़े चार हजार फूल निकलते हैं।

50% सरकारी अनुदान से 25 डिसमिल प्लाॅट पर पाॅलिहाऊस/ग्रीनहाऊस बैठाने का कुल खर्च लगभग 6 लाख रुपये का रहा। ऐसे में 3 लाख इनके स्वयं की लागत रही। इस लागत को इन्होंने कुछ ही महीनों में वापस कमा लिया। वर्तमान में इनके पास चार पाॅलीहाऊस हैं, जिससे सिजन में हर महिने 3-4 लाख तक की कमाई आराम से हो जाती है।

श्री गंसु महतो जी कृषि में रुची रखने वालों के सहयोग के लिए हमेशा तत्पर रहते हैं और हर संभव जानकारी और मदद साझा करते है।

गंसु महतो का यह प्रयास संस्थागत ढाँचे को बनाएँ रखते हुए नए अवसर की तलाश की अनुठी कहानी है। आवश्यक यह नहीं की हर नयी चीज करने के लिए पुरानी चीजों को छोड़ दिया जाए। तरकिब कामगार वही है जो दोनों ही क्षेत्र में सही तालमेल के साथ किया जाए और गंसु महतो की विशिष्ट स्वभाविक योग्यता ने संस्थागत क्षेत्र के एक तान वाली नीरसता में एक नया उंमग तरंग और अवसर दिखाया है।

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