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फ्लाइट की आपातकालीन लैंडिंग के अलावा नहीं था कोई और चारा, फिर एक IITian के जुगाड़ से बची जान

हमारे समाज में हर पेशे का अपना मोल है, हर पेशा अपने आप में जरूरी है और विभिन्न प्रकार से समाज के काम आता है। पर डॉक्टर और इंजीनियर का पेशा ऐसा है जिसकी न केवल समाज में मांग ज्यादा है बल्कि यह रोजगार के सबसे चर्चित विकल्प के तौर पर भी उभर कर आये हैं। यह बात भी सत्य है कि इन दोनों ही पेशों में जितना आपका ज्ञान काम आता है, उतना ही काम आपका कौशल, बौद्धिकता एवं रचनात्मक सोच भी आती है। और यह तीनों पहलू इन दोनों पेशों के लिए उतने ही जरूरी हैं जितना कि उनका उस पेशे से जुड़ा ज्ञान।

एक हालिया उदाहरण में इन्हीं तीनों पहलुओं का उपयोग करते हुए एक इंजीनियर ने उड़ान के बीच एक व्यक्ति की जान बचाकर यह साबित कर दिया है, अगर आपको अपने कौशल, बौद्धिकता एवं रचनात्मकता पर भरोसा है तो फिर आप असंभव कार्य को संभव कर सकते हैं। आइये जानते हैं कार्तिकेय मंगलम नाम के इस इंजीनियर की कहानी जोकि आईआईटी कानपुर में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के छात्र हैं और इस घटना के दौरान स्विट्ज़रलैंड से एक शिक्षण संस्थान (जहाँ वो आईआईटी कानपुर के छात्र विनिमय कार्यक्रम के तहत पढ़ रहे थे) की अपनी अंतिम सेमेस्टर की परीक्षा देकर विमान से वापस भारत लौट रहे थे। उन्हें उड़ान के बीच मालूम पड़ा कि फ्लाइट के अंदर किसी सह-यात्री को चिकित्सा सहायता की आवश्यकता है और फिर जो उन्होंने किया वह प्रशंसनीय है।

बीच उड़ान में हुई सह-यात्री की तबियत ख़राब

30 वर्षीय थॉमस, जोकि 11 वर्ष की उम्र से टाइप 1 डायबिटीज़ के मरीज़ हैं, वो इस उड़ान में अपने इंसुलिन पाइप को ले जाना भूल गए थे। मास्को एयरपोर्ट पर थॉमस को सुरक्षा जांच के दौरान अपना इंसुलिन पाइप निकालना पड़ा और फिर वो उसे अपने साथ दोबारा रखना भूल गए। उड़ान में जाने के बाद उन्हें ध्यान आया की वो अपना इंसुलिन पाइप भूल चुके हैं, हालाँकि अब बहुत देर हो चुकी थी और वो उस इंसुलिन पाइप को उड़ान में किसी भी प्रकार से वापस पा नहीं सकते थे। हालाँकि शुरुआती 5 घंटे तो सब ठीक रहा लेकिन इतने लम्बे समय तक इंसुलिन की डोज़ न लेने के चलते उनके शरीर में ब्लड-शुगर का स्तर सामान्य स्तर से इतना बढ़ चुका था कि कुछ अनहोनी होने की आशंका भी पैदा होने लगी।

उनकी बिगड़ती हालत को देखते हुए एयर होस्टेस ने उड़ान में यह घोषणा की कि एक मरीज़ को चिकित्सा सहायता की आवशयकता है और क्या इस उड़ान में कोई डॉक्टर मौजूद है? यह सुनते ही उड़ान में मौजूद एक डॉक्टर आगे आये और उन्होंने थॉमस की बिगड़ती हालत को देखा, और कुछ समय के पश्चात उन्होंने बताया कि अगर थॉमस को तुरंत इन्सुलिन की डोज़ नहीं दी गयी थी वो शायद जीवित नहीं रह पाएंगे। हालाँकि भाग्यवश उस डॉक्टर के पास, खुद एक डायबिटीज मरीज़ होने के चलते, इन्सुलिन पाइप और डोज़ उड़ान में मौजूद थी। हालाँकि डॉक्टर के पास मौजूद इन्सुलिन डोज़, थॉमस की आवश्यकता वाली इन्सुलिन डोज़ से भिन्न थी।

चूँकि उस उड़ान में डॉक्टर और थॉमस के पास अन्य कोई उपाय नहीं था इसलिए यह ठीक समझा गया कि डॉक्टर वाली इन्सुलिन डोज़ को थॉमस को दिया जाए। उन्हें उड़ान में एक निजी स्पेस दिया गया जहाँ वह थॉमस को आराम से वो डोज़ दे सकें। हालाँकि डोज़ देने के ठीक एक घंटे बाद थॉमस की हालत और ज्यादा बिगड़ गयी और उनके मुहँ से झाग बाहर आने लगा। इसके बाद यह लगने लगा था कि शायद अब थॉमस जीवित नहीं बच पाएंगे

फ्लाइट की आपातकालीन लैंडिंग के अलावा नहीं था और कोई चारा

जब थॉमस की हालत ज्यादा बिगड़ गयी तो विमान चालक ने अफग़ानिस्तान-कज़ाख़िस्तान क्षेत्र में आपातकालीन लैंडिंग का विचार किया। हालाँकि यह एक आतंकवाद प्रभावित इलाका था और लैंडिंग के लिए भी एक घंटे का समय लगने वाला था। यह वो समय था जब कार्तिकेय मंगलम उठकर मरीज़ के पास गए और उनकी मदद करने के तरीके पर विचार करने लगे। दरअसल, फ्लाइट में इंसुलिन तो थी, लेकिन उसमें डॉक्टर की दी हुई कारट्रिज फिट नहीं हो रही थी। उसमे जैसे ही डॉक्टर अपनी कारट्रिज फिट करते वो जरुरत अनुसार काम नहीं कर रही थी। इसके बाद कार्तिकेय ने विमान के वाईफाई की मदद से उस इन्सुलिन पेन की बनावट के बारे में पढ़ा और फिर उसी अनुसार यह भी देखने लगे कि आखिर कैसे उसका हर हिस्सा उसके साथ कैसे फिट होता है। उन्हें यह पता था कि वो यह सब अपने इंजीनियरिंग कोर्स के दौरान पढ़ चुके थे। जरुरत थी तो बस रचनात्मकता एवं सूझबूझ से उस पढ़ाई को अपने कौशल में इस्तेमाल करने की।

और इन सब के बाद उन्हें पता चल गया कि उस इन्सुलिन पेन में स्प्रिंग की कमी थी। फिर क्या था, उन्होंने विमान में लोगों से पूछताछ की कि क्या किसी के पास पेन है, उसके बाद उन्होंने पेन में मौजूद स्प्रिंग निकाली और उसे इंसुलिन पेन में फिट कर दिया। इंसुलिन पेन में थॉमस की कारट्रिज फिट हो गई और डॉक्टर ने इससे थॉमस को डोज देकर उनकी जान बचाई।

कार्तिकेय कहते हैं “मैंने अपने इंजीनियरिंग में पढ़ाई के दौरान यह विधि सीखी थी, मैंने लोगों से पेन की मांग की और इसमें से स्प्रिंग निकाल कर उसे कार्ट्रिज में फिट कर दिया,”।

15 मिनट के भीतर थॉमस को हुआ आराम

“15 मिनट के भीतर ही थॉमस को आराम हो गया, यह मेरे लिए काफी सुकून देने वाला क्षण था। डॉक्टर ने बताया कि अब सब ठीक है और आपातकालीन लैंडिंग की कोई जरूरत नहीं,” कार्तिकेय ने आगे कहा। न केवल विमान के अंदर बल्कि विमान से निकलकर उन्होंने थॉमस को मेदांता हॉस्पिटल ले जाकर इंसुलिन पेन दिलाने में उनकी मदद की। “थॉमस ने मुझे शुक्रिया कहा और मुझे एम्स्टर्डम आने को आमंत्रित किया,” कहना था थॉमस का।

कार्तिकेय को उन्हें आईआईटी कानपुर में पढ़ाये गए कॉन्सेप्ट्स का भी फायदा मिला जिसके दम पर उन्होंने अपनी सूझबूझ से इस अनहोनी को होने से टाल दिया। उन्होंने खुद भी इस बात को कहा कि, “अगर मुझे आईआईटी में यह सब पढ़ाया न गया होता तो आज शायद मैं थॉमस की मदद नहीं कर पाता, मैं अपने शिक्षकों का आभारी हूँ,” अपनी बात को खत्म करते हुए कार्तिकेय का कहना था।

हम कार्तिकेय की सूझबूझ के लिए उनको सलाम करते हैं और उम्मीद करते हैं कि कार्तिकेय के जैसे हम सब भी अपनी शिक्षा के साथ-साथ अपनी रचनात्मकता से दूसरों के काम आ सकेंगे।

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