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बेटे बेटियों की दुर्घटना में मौत के बाद माता-पिता ने किया ऐसा काम जिसकी हर तरफ हो रही प्रशंसा

दुनिया का कोई भी माता-पिता यह दिन देखना नहीं चाहेगा कि उनके बच्चों की मौत उनसे पहले हो जाए। उस दर्द और आघात से गुजरने का सा भयानक अनुभव और कुछ भी नहीं होता। एक ऐसा ही दर्दनाक हादसा दिल्ली के पंजाबी बाग़ इलाके में हुआ था जिससे कई परिवारों की ज़िन्दगियों पर दुःख के पहाड़ टूट पड़े। बच्चे की मौत के बाद किसी भी पिता का हौसला ही टूट जाता है लेकिन ये ऐसे पिता हैं जिनके साहस और जज़्बे को आप भी सलाम करेंगे।

सात युवा बच्चे परीक्षा देने जा रहे थे कि तभी उनकी कार फ्लाई ओवर से टकरा गई और गाड़ी 25 फ़ीट नीचे रेलवे ट्रैक के पास जा गिरी। संचित छाबड़ा (19) और ऋतु सिंह (18) सहित चार की मृत्यु इस हादसे में हो गई। इस अपूरणीय क्षति ने उनके माता-पिता को झकझोर कर रख दिया और वे अभी तक सदमे में हैं। एक युवा बच्चे को खो देने का घाव उन्हें ता-उम्र सालता रहेगा। इस कठिन समय में संचित और ऋतु के माता-पिता ने ऐसा काम कर दिया कि वे वाह-वाही के हक़दार बन गए।

संचित और ऋतु के माता-पिता ने उनकी आँखे दान कर दीं ताकि किसी और की जिंदगी में उजाला हो सके l

संचित के पिता राजकुमार छाबड़ा कहते हैं – “मेरा बेटा तो चला गया पर कम से कम दो दूसरे लोग उसकी आँखों से दुनिया देख पाएंगे l यह सब सोच कर ही शायद मुझे कुछ सुकून मिल जाए।”

यही सोच ऋतु के पिता मलखान सिंह की भी है। उन्होंने भी बिना किसी हिचकिचाहट के अपनी बेटी की आँखे दान करने के लिए हाँ कर दी। आँखों में आंसू लिए ऋतु के पिता कहते हैं – “एक एनजीओ ने उन्हें दो व्यक्तियों से मिलाया जिन्हें ऋतु की आँखे लगनी थी। मेरी बेटी उन दोनों के ज़रिये हमेशा ज़िंदा रहेगी l मैं हमेशा उनसे मिलता रहूँगा और हमेशा उनसे संपर्क रखूँगा।”

छाबड़ा कहते हैं कि एक समय उनके दिमाग में यह बात आ गई थी कि वे अपने बेटे के शरीर के सभी अंग दान करना चाहते थे। संचित के पिता कहते हैं -“जब एनजीओ वाले उनसे मिले और अंग दान के लिए अनुरोध किया तब तक केवल आँखे ही उपयोग में आ सकती थी। हम बिना सोचे ही उसकी आँखे दान करने के लिए तैयार हो गए। मेरा बेटा एक मददगार और स्नेहिल लड़का था, अपनी मौत के बाद भी उसने लोगों की मदद की।”

भारत में अंग दान उतना प्रचलित नहीं है क्योंकि धार्मिक मान्यता है कि अगर मृत शरीर का कोई भी हिस्सा भंग है तो उसकी आत्मा को शांति नहीं मिलती। इस प्रतिगामी और अन्धविश्वास के चलते लोग समाज के लिए यह महत्वपूर्ण योगदान नहीं दे पाते हैं। संचित और ऋतु के माता-पिता ने यह कदम उठाकर समाज के सामने एक बेमिसाल उदाहरण पेश किया है।

संचित और ऋतु के पिता ने लोगों से यह आग्रह किया है कि लोग अंग दान के लिए आगे आएं क्योंकि अंग दान ही मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सेवा है। हम सभी स्वस्थ हैं पर हर किसी को यह नसीब नहीं होता। हम ऐसे समाज में रहते हैं जहाँ बहुत से लोग शारीरिक रूप से अक्षम हैं जिन्हे सामाजिक कलंक को झेलना पड़ता है। आज भी हम उनके जीवन को बेहतर बनाने के लिए इस महान दान के लिए आगे नहीं आते हैं l

रूठ के मेरी जहाँ से सहसा, मूँद ली उसने थीं आँखें अपनी, जा छिपा है वो सितारों में कहीं, रोप उस चेहरे पे आँखें अपनी  l

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