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अवश्य पढ़ें: सरकारी स्कूल में हालात की बेहतरी के लिए एक IAS ऑफिसर की शानदार पहल

हमारे देश में सरकारी सेवाओं की चमक मात्र नौकरी पाने तक ही सिमित हो कर रह गई है। सरकारी स्कूलों, अस्पतालों, परिवहन और अन्य सेवाएँ बुरी स्थिति में है जिसका लाभ कोई लेना नहीं चाहता और यह मजबूरी की स्थिति में निर्धन और समाज के पिछड़े वर्गो के लिए मात्र एक प्रतिक बन कर रह गया है। गौरतलब है कि 2015 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सरकारी अफसरों के लिए आदेश जारी किया था कि वे सभी अपने-अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाएं। सरकारी स्कूल में अफसरों के बच्चे पढ़ेंगे तो इन स्कूलों की हालत अपने आप बेहतर हो जाएगी। हालांकि वह आदेश भी ठंडे बस्ते में चला गया था और शायद ही किसी अधिकारी ने अपने बच्चे का दाखिला सरकारी स्कूल में कराया हो।

मगर छत्तीसगढ़ के बलरामपुर के कलेक्टर अविनाश कुमार शरण ने वो कर दिखाया जो उत्तरप्रदेश के अधिकारी न्यायालय के निर्देश के बावजूद नहीं कर पाए थे। उन्होंने अपनी बच्ची का एडमिशन बलरामपुर के ही सरकारी स्कूल प्रज्ञा प्राइमरी स्कूल में करवाया। अवनीश की इस पहल की हर तरफ तारीफ हुई। अब एक बार अवनीश फिर चर्चा में हैं। उनकी एक फोटो वायरल हो रही है। इसमें वो अपनी बेटी के साथ सरकारी स्कूल में बैठकर ही मिड डे मील खा रहे हैं और बच्ची को भी खिला रहे हैं।

बिहार के समस्तीपुर जिले के केवटा गाँव से आनेवाले 2009 बैच के आईएएस अधिकारी अवनीश अपनी 5 वर्षीया बेटी वेदिका शरण, की शुरुआती पढ़ाई आंगनबाड़ी से कराई और अब एक जिम्मेदार अभिभावक का परिचय देते हुए दोनों पति-पत्नी ने बच्ची का नामांकन सरकारी विद्यालय में कराकर सरकारी व्यवस्था पर भरोसा कायम किया है।

आपकी जानकारी के लिए बताना चाहते हैं कि अवनीश सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर रंजीत सिन्हा के दामाद हैं। उनकी पत्नी रुद्रानी सिन्हा, जो स्वयं भी एक अाॅफिसर हैं। दादाजी व पिताजी शिक्षा के पेशे से जुड़े रहे हैं। मां गृहिणी रही हैं। उनकी पूरी स्कूलिंग गांव के ही सरकारी स्कूल में हुई है। मिथिला यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन की पढ़ाई की। एक सामान्य परिवार से ताल्लुक रखने की वजह से उन्हें लालटेन में पढ़ाई करनी होती थी। इस दौरान जब वे गांव में और कॉलेज की पढ़ाई के दौरान कई मौकों पर आईएएस अधिकारियों को देखते तो मन में उनके काम को और ज्यादा जानने की कौतुहल होती, साथ ही उनके जैसा ही काम करने के उनके ख्वाब को मजबूती मिलती थी।

उनकी कर्तव्यनिष्ठता और ईमानदारी के लिए न सिर्फ छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह, वरन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी सराहना और सम्मानित कर चुके हैं। अवनीश शरण ऐसे अधिकारियों में से हैं जो अपने कार्य के जरिये जनता से जुड़े हुए हैं और उनके बीच रहकर ही काम करना पसंद करते हैं।

 

अवनीश ने अपनी इस पहल पर कहा था कि ये बात मीडिया के लिए एक खबर हो सकती है, लेकिन मेरे लिए तो सिर्फ एक कर्तव्य है। इस पहल से हो सकता है लोग सरकारी स्कूलों की शिक्षा से जुड़ें।

जहाँ अमीरों और अफसरों के बीच बच्चों को महँगी से महँगी शिक्षा देने की धारणा बन चुकी हो, वहीं अवनीश कुमार शरण जैसे अफसरों की सादगी का सामने आना वाकई मिसाल है। युवाओं के बीच यह कहानी बदलाव की निशानी के तौर पर देखी जानी चाहिए। इनसे प्रेरित होकर देश के तमाम छोटे-बड़े अफसरशाहों को जनता का विश्वास सरकारी व्यवस्था पर कायम करने की मुहिम में साथ आना होगा। ऐसे छोटे-छोटे प्रयास ही बड़े बदलाव के गवाह बनते हैं।

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