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पानी के अभाव में जहाँ सालों से खेती नहीं हो पा रही थी, वहां एक टीचर की सूझबूझ ने क्रांति ला दी

बंजर जमीन, सूखा क्षेत्र और 400 मिलीमीटर से भी कम बारिश। एक ऐसा इलाका जहां सालों भर सूखा रहता था, खेती तो किसी मायने में संभव ही नहीं थी, लेकिन इसी जगह एक शख्स ने अपनी सूझबूझ से न सिर्फ सफलतापूर्वक खेती की बल्कि गन्ने जैसी फसल की पैदावार की, जिसे सबसे ज्यादा पानी की जरूरत होती है। आप भी सोच रहे होंगे कि भला यह कैसे संभव हो पाया?

तो आइये आज मिलते हैं शिक्षक से किसान बने महाराष्ट्र के एक भजनदास पवार से। बतौर शिक्षक 28 साल तक अपनी सेवा देने के बाद उन्होंने अपने गांव की स्थिति सुधारने का बीड़ा उठाया। और आज उनकी एक छोटी मुहिम ने गाँव की दशा और दिशा को बदलकर रख दिया है।

सूखी धरती में उगा दिए अनाज

बीएससी-बीएड के बाद भजनदास को एक अच्छी सरकारी नौकरी मिल गयी लेकिन उन्हें तो कुछ और ही मंजूर था। अच्छी नौकरी और अच्छी सैलरी के बाद भी उनका मन नहीं लगा और उन्होंने नौकरी छोड़ दी, दरअसल उन्हें शहर का माहौल रास ही नहीं आता था और वो गाँव जाकर कुछ करना चाहते थे। उन्होंने नौकरी छोड़ी और 1988 में गाँव का रुख किया। गाँव में भी उन्होंने शिक्षण को ही चुना। इसके लिए वे रोज़ाना 96 किलोमीटर का सफर तय करते थे। महज 1600 लोगों की आबादी के इस गाँव में हर घर में सरकारी नौकरी में कार्यरत लोग हैं। लेकिन गांव के 7 किमी के क्षेत्र तक पब्लिक ट्रांसपोर्ट तक की सुविधा नहीं है। यहाँ तक की सालों से कभी कोई अनाज पैदा ही नहीं हुआ, इस क्षेत्र को सूखा घोषित किया जा चुका था। लेकिन इस सूखे और बंजर धरती पर भी भजनदास पवार ने अनाज उगा दिए।

चिंकारा को बचाने का बीड़ा उठाया

इसमें उन्हें आंदोलनकारी अन्ना हजारे का साथ मिला। अन्ना के साथ मिलकर भजनदास ने 1994 में आदर्श गांव योजना के तहत वाटर शेड मैनेजमेंट की ट्रेनिंग ली और फिर शुरू हुई उनकी मुहिम। अपनी मुहिम में उन्होंने पढ़े लिखे युवाओं को शामिल करना शुरू किया। लेकिन ये इतना भी आसान नहीं था। युवाओं को प्रेरित करने में उन्हें खासा दिक्कत आई। लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपने फैक्ट्स, तकनीक और जागरूकता अभियान के जरिए युवाओं को जोड़ा। उन्हें कई जगह से प्रोत्साहना भी मिली। इतना ही नहीं भजन दास जंगलों को बचाने में भी काफी काम कर रहे हैं। अपने क्षेत्र के जंगलों में रहने वाले चिंकारा को शिकारियों से बचाते हैं। चिंकारा बचाने के लिए उन्हें सरकार की तरफ से एक करोड़ की राशि भी मिली।

गांव वाले भी हुए प्रेरित

ऐसा करके उन्होंने ग्राम विकास के मकसद को पूरा किया, मकसद है कि गांव के लोग गांव में ही रहे, शहर न जाएं, गाँधी का ये सपना उन्होंने पूरा कर दिखाया। अन्ना हजारे से प्रेरित भजन दास का सपना अपने गांव को सम्पूर्ण और आदर्श बनाने का था। उनसे प्रेरित होकर गांव वाले भी पानी बचाने की मुहिम में जुट गए और 3-4 फीट गहरे गड्ढे खोदने लगे। पानी को रिसने से बचाने के तरीके निकालने लगे। वे सभी ऐसे अनाज उगाने लगे जिसमें कम पानी की जरूरत होती है, अनार से इसकी शुरुआत हुई।

धीरे-धीरे जल संरक्षण का प्रभाव ग्रामवासियों को दिखने लगा। पहले जहाँ किसान ज्वार और बाजरा की खेती के लिए बारिश पर अधिक निर्भर रहे थे, आज वही 500 हेक्टेयर कृषि भूमि पर अनार का उत्पादन कर रहे हैं। इतना ही नहीं पुणे, हैदराबाद, मुंबई और बेंगलुरु जैसे कई बड़े शहरों में अनार का एक्सपोर्ट भी कर रहे हैं।

केनफ़ोलिओज़ से ख़ास बातचीत में भजनदास ने बताया कि 200 हेक्टेयर से अधिक भूमि का उपयोग अन्य फसल जैसे कि गन्ना और विभिन्न सब्जियों और मौसमी फसलों को विकसित करने के लिए किया जाता है। इससे किसानों को अच्छी आमदनी भी हो रही है।

अब बच्चों को नौकरी की तलाश और माँ-बाप की मदद के लिए पढ़ाई भी नहीं छोड़नी पड़ रही। भजनदास के नेतृत्व में ग्राम वासियों ने खेती-किसानी के क्षेत्र में जो मिसाल पेश की है वह वाकई बेहद प्रेरणादायक है।

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