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दुर्घटना की वजह से UPSC ने अस्वीकार कर दिया, आज विकलांगों की जिंदगी में रोशनी ला रही हैं

जीवन में बदलाव खुद से नहीं आते, उन्हें लाने के लिए लगातार चुनौतियों से होकर गुज़रना पड़ता है। ज़िन्दगी की लड़ाई बहुत कठिन लड़ाई होती है, बिना ज़ख्मों के मिली जीत सम्मान के योग्य नहीं होती। किसी व्यक्ति की कमियां कभी-कभी उस विशेष सफर की ओर इशारा करती होती हैं जिस के रास्ते पर उसे निकलना होता है; और यह भी कि उन्हें मामूली नहीं बल्कि नायाब सफलताओं के लिए तराशा गया है।

आज मिलते हैं 36 वर्षीया समाज सेविका श्रुति महापात्रा से, जो प्रतियोगी परीक्षाएं दे रहे विद्यार्थियों के लिए स्टडी सर्किल चलाती हैं। 1987 में श्रुति ने सिविल सर्विसेज की परीक्षा में अलाइड सर्विसेज में अपना स्थान बनाया ही था कि एक अचानक हुए हादसे से उनके शरीर का निचला हिस्सा पूरी तरह से पैरालाइज़ हो गया।

इस एक्सीडेंट ने उनका पूरा जीवन ही बदल कर रख दिया परन्तु आज श्रुति शारीरिक रूप से विकलांग लोगों के लिए बिना थके काम कर रही हैं। वह उन्हें वे अवसर प्रदान कर रही हैं जो उन्हें व्हीलचेयर में होने की वजह से नहीं मिल सके।

वे कहती हैं, “अपना घर उन्हीं ईटों से बनाओ जो दूसरों ने तुम पर फेंका है।”

भुबनेश्वर की समाज सेविका श्रुति का अपने विद्यार्थी जीवन में उत्कृष्ट शैक्षिक रिकॉर्ड रहा है। उन्होंने डेवलपमेंटल बायोलॉजी में पीचडी की डिग्री ली और एमएससी में गोल्ड मैडलिस्ट रहीं। उन्होंने 1978 में उत्कल युनिवर्सिटी से बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड जीता और 1981 से 1983 तक राष्ट्रीय वाद-विवाद प्रतियोगिता में भी जीत हासिल कीं। वे साक्षरता चैंपियन भी रह चुकी हैं। शिक्षा के प्रति उनके जूनून के चलते वे 1987 में यूपीएससी की परीक्षा में बैठीं जहाँ उन्होंने अपने आपको सिद्ध करते हुए परीक्षा में सफल भी रहीं और “ए” ग्रुप में चयनित भी हुईं।

श्रुति के पास सब कुछ था। उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा पास की, उन्हें ज़िन्दगी में अपना प्यार भी मिला और आगे उनका चमकता भविष्य दिखाई दे रहा था। परन्तु ज़िन्दगी ने उनके लिए कुछ और ही चुन रखा था। इंटरव्यू के कुछ दिन बाद, जब वे अपने परिवार के साथ मंदिर से अपने घर लौट रही थीं, एक तेज चलती बस ने उनकी गाड़ी पर तेज ठोकर मार दी।

श्रुति का स्पाइनल कॉर्ड बुरी तरह से चोटिल हो गया था और उनके शरीर का निचला हिस्सा पैरालाइज हो गया था। उन्हें पूरी ज़िन्दगी व्हीलचेयर पर गुजारनी थी। एक ही रात में उनकी पूरी ज़िन्दगी बदल गई। श्रुति बताती हैं, “मेरे एक्सीडेंट के बाद, मैंने और मेरे मंगेतर ने शादी बाद में करने का तय किया था। परन्तु उसने किसी और से शादी कर ली और यह मेरे लिए बहुत बड़ा झटका था।”

जब उनके पिता ने यूपीएससी और दूसरे सरकारी लोगों को श्रुति के बारे में कुछ करने को लिखा, तब उन्हें पीछे की रैंक और तनख्वाह की पेशकश की गई। जब श्रुति ने इसके खिलाफ़ आवाज़ उठाई, तब पैनल ने उन्हें नौकरी ही नहीं दी।

वे कहती हैं, “अप्रैल का महीना मेरे लिए बड़ा ही क्रूर रहा है। आज 12 साल बाद मेरी ज़िन्दगी बेहतर है। आज मैं यह नहीं सोच पाती कि मैं इससे बेहतर कर पाती, अगर परिस्थितियां इससे अलग होतीं तो।”

श्रुति के साथ हुए इस भयानक हादसे से भी उसके सीखने और आगे की पढ़ाई चालू रखने की ज़िद में कोई रुकावट नहीं आयी और उन्होंने जूलॉजी में अपनी पीएचडी पूरी की। 1993 में उन्होंने यंग साइंटिस्ट अवार्ड जीता। उनकी शैक्षिक योग्यता बहुतों के लिए प्रेरणा है। वे कहती हैं, “मैंने अपने आप को ऐसी सभी मानसिकता को तोड़ने के लिए एक ऐसी जगह पर पहुंचाया है जहाँ हर कोई हर किसी को उसकी क्षमता और योग्यता के साथ स्वीकार करे न कि उसकी कमजोरियों को देखकर। मैं अपने आप को ओडिसा के हर उस दूरस्थ इलाके तक ले कर जाऊंगी जहाँ आख़िरी विकलांग होगा और उससे कहूँगी कि कुछ भी असंभव नहीं है।”

1987 से 1996 तक इन्होंने विद्यार्थियों को प्रतियोगी परीक्षाओं और सिविल सर्विसेस की परीक्षाओं के लिए शिक्षित किया। 2007 तक इन्होंने लगभग ऐसे 300 विद्यार्थियों को ट्रेंड किया जो शिक्षा, बैंकिंग, और रिसर्च की फील्ड में अपना स्थान सुनिश्चित करने में सफल रहे।

2001 में श्रुति ने भुबनेश्वर स्थित नॉन-प्रॉफिट संस्था स्वाभिमान की स्थापना की जो ओडिसा के विकलांग लोगों का सशक्तीकरण करता है। वे उत्कल युनिवर्सिटी में विकलांगता की कोऑर्डिनेटर हैं। वे चेन्नई स्थित डिसेबिलिटी इंटरनेशनल की भी कोऑर्डिनेटर हैं और एशिया पैसिफिक डिसेबल्ड विमेंस नेटवर्क पब्लिकेशन की एडिटोरियल बोर्ड मेंबर भी हैं।

श्रुति ने यह सिद्ध कर दिया है कि कोई भी बाधा बहाना नहीं बन सकती अगर आप सचमुच जीवन में कुछ करना चाहते हैं। सक्षमता और विकलांगता केवल मन की दशाएं हैं। अगर आप में कुछ हासिल करने का ज़ज़्बा है, दृढ़ संकल्प है; तब आप हर चुनौती और कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए भी जीत हासिल कर सकते हैं।

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