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हजारों की जिन्दगीं में कठिनाई के वक्त में एक उम्मीद की किरण है यह अकेला व्यक्ति, प्रेरणा से भरी है इनकी निःस्वार्थ सेवा

भूख से तड़पते बच्चों या मायूसी में डूबे इंसान को देखकर किसका दिल नहीं पसीजता? अपने बच्चे के शव को देख बिलखती माँ को कौन अनदेखा कर सकता है? लेकिन हर किसी का दुःख इतनी आसानी से नज़र नहीं आता। ऐसे लोगों की भावनाओं को समझना कितना मुश्‍किल है जिनकी समस्याओं को हमने कभी नहीं झेला है। वे लोग जो हताश हैं, जिन लोगों के हालात से हम कभी नहीं गुज़रे हैं, उनके लिए भी हम हमदर्दी पैदा करें और ऐसा करना जरूरी भी है। दूसरों के हालात, उनकी भावनाओं, उनकी जरूरतों और दूसरे के हालात में खुद को रखकर सोचने की काबिलियत ही हमदर्दी है, जिसका मतलब दूसरे का दर्द अपने सीने में महसूस करना है। ऐसे ही एक हमदर्द इंसान है सरबजीत सिंह उर्फ बाॅबी

इन्होंने विभिन्न अस्पतालों में मरीजों के लिए निःशुल्क कैंटीन खोले हैं, वे शवों के अंत्येष्टि के लिए मुफ्त गाड़ी की सेवा देते हैं और स्वयं चलाते हैं। वे अक्सर रक्तदान शिविरों का भी आयोजन करते हैं। जाड़े में कपड़े दान की व्यवस्था करते हैं। उन्होंने ज़रूरतमंदों के लिए एक रोटी बैंक भी बनाया है।

20,000 यूनिट से भी अधिक रक्त जुटाया

सरबजीत सिंह जो वेल्ला बाॅबी के नाम से प्रसिद्ध हैं। पंजाबी शब्द ‘वेल्ला’ का प्रयोग वैसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जिसे कोई काम न हो। यहाँ तक की उनकी माँ भी उन्हें इसी नाम से पुकारती हैं। सरबजीत पेशे से लोअर बाज़ार, शिमला में जूते की दुकान चलाते हैं। यहीं से उनके परिवार की जरुरतें पूरी होती है और लोक-हितैषी कामों के लिए धन की व्यवस्था भी। पिछले कुछ वर्षों से उनकी जीवन यात्रा बेहद मोहक और ढ़ेरों अनुभवों और दुआओं से परिपूर्ण है।

“इन सब की शुरुआत 12 साल पहले हुई जब मैं एक स्थानीय गुरुद्वारा में स्वयंसेवक के तौर पर वहाँ रक्तदान शिविर के आयोजनों में सहयोग दिया करता था। बीतते समय के साथ धीरे-धीरे गुरुद्वारा में रक्तदान शिविर का आयोजन करना बंद कर दिया। बावजूद इसके, मैंने स्वयं शिविरों के आयोजन करने का निर्णय किया” ,उन्होंने बताया।

11 सालों से सरबजीत प्रत्येक रविवार को रक्तदान शिविर का आयोजन करते हैं। अबतक सफलतापूर्वक उन्होंने 20,000 यूनिट खून जुटाया है। शिमला के बड़े अस्पतालों में हमेशा ब्लड की कमी रहती है ऐसे में जरूरत पड़ने पर राज्य के सभी ब्लड बैंक सरबजीत पर ही भरोसा करते हैं। इतना ही नहीं वे खुद भी पचास से अधिक बार रक्तदान कर चुके हैं।

लाशों को निःशुल्क पार लगाना

गाड़ी चलाने में सरबजीत को बहुत रूचि थी, इसलिए उन्होंने मृतशव वाहन चलाना शुरु किया। यह सेवा 24X7 उपलब्ध होती है जिससे हजारों को उनके अंतिम यात्रा में मदद मिलती है। शुरुआत के दौर में शमशान घाट अस्पताल बहुत दूर थे। ऐसे में शवों को ले जाना एक भारी काम था खास कर शाम 5 बजे के बाद जब शोकाकुल परिवार की मदद करने को कोई तैयार नहीं होता था। 2012 में लोक-वित्त से एक वैन खरीदा और अब तक उन्होंने 5000 से अधिक शवों को ढ़ोया है।

“मृतशव वाहन चलाने के दौरान के अनुभवों ने मुझे काफी कुछ सिखाया है।”

वे तीन घटनाओं को विशेष रुप से याद करते हैं। एक नौ वर्ष की बच्ची की बात, एक और हिन्दू मज़दूर की दशा जिसे दफनाना था और एक तब जब उन्हें एक मठवासी के शव को 4 बजे सुबह ले जाना पड़ा था ताकि सूर्य की पहली किरण के साथ उसका दाह संस्कार हो सके।

“मुझे अबतक याद है जब मैं उस बच्ची के पार्थिव शरीर को उसकी व्याकुल माँ के घर तक लेकर जा रहा था। तब मुझे पहली बार एहसास हुआ कि यह काम कितनी बड़ी समाज सेवा है और इससे मुझे मेरे इस सेवा को जारी रखने को और भी बल प्राप्त हुआ।”

फैलाते हैं मुस्कान

मानवता की सेवा की अन्तरीकरण इच्छा से सरबजीत ने एक गैर-सरकारी संस्था (NGO) ऑलमाइटी ब्लैसिंग्स (Almighty Blessings) की शुरुआत की। शवों को ढ़ोने के अलावे वे अनाथालयों और वृद्धाश्रम के लोगो को शिमला शहर और आसपास सैर के लिए लेकर जाते हैं। उनके सेवाओं की कोई सीमा नहीं है और वे राज्य में सर्वत्र हजारों के चेहरे पर मुस्कान ला रहे हैं।

अक्टूबर 2014 में उन्होंने इंदिरा गाँधी मेडिकल काॅलेज, शिमला और अन्य अपर्याप्त विकसित क्षेत्रों में मरीजों और उनके संबंधी के लिए और भी निःशुल्क कैंटीन प्रारंभ करने का फैसला किया। शुरुआत में उन्होंने अपनी संस्था ऑलमाइटी ब्लैसिंग्स के जरिए नाश्ता देना आरंभ किया। चाय-बिस्कुट व ब्रेड से शुरू हुआ ये सफर अब दोपहर व रात के भरपेट भोजन तक पहुंच गया है। जिन मरीजों को खिचड़ी की जरूरत होती है, उन्हें खिचड़ी भी दी जाती है। सबसे बड़ी बात ये है कि चावल, दाल व आटा बेहतर क्वालिटी का यूज किया जाता है।रोजाना डेढ़ से दो हजार लोग निशुल्क भोजन ग्रहण करते हैं।

“हमें सिर्फ मानवता की सेवा करनी चाहिए और न किसी धर्म की नहीं। मेरी सोच और इच्छा सिर्फ यह है कि केवल एक ही सरबजीत न हो बल्कि हिन्दूस्तान के हर कोने में कोई जो हालात के मारे लोगों के लिए हमदर्दी रखता हो।”

 

तदनुसार 2016 में NGO ने शिमला के सबसे बड़े अस्पताल द कमला नेहरु हाॅस्पिटल में एक दूसरा मुफ्त कैंटीन खोला है। उन्होंने एक चपाती बैंक भी बनाया है जो पाँच अलग अलग स्थानों पर उन लोगो को सेवा प्रदान करता है जो दवा खरीदने में तो सक्षम नहीं ही हैं और दो जून की रोटी भी नहीं खा पाते हैं। शिमला में ठंढ आने के साथ ही वे कपड़े दान करने में व्यस्त हो जाते हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि राज्य के कड़ाके की ठंड प्रचंडता में कोई भी दुबक कर न रहे।

अब सरबजीत की योजना मरीजों और उनके संबंधी के लिए एक आश्रय स्थल बनाने की है। यह कल्पना करना भी कठिन है कि एक अकेला व्यक्ति लोगों की मदद के लिए सिर्फ अपने दम पर इतना कुछ कर सकता है। उन्हें दूसरों की खुशी में ही खुशी मिलती है

हालात की मार झेलते लोगों के प्रति हमदर्दी रखने वाले नेकदिल इंसान सरबजीत सिंह उर्फ बाॅबी हर संभव तरीके से असमर्थ और ज़रूरतमंद लोगों के जीवन की कठिनाइयों को कम करने का काम कर रहे हैं। समाज के लिए यह एक बड़ा प्रोत्साहन है जिससे अभावग्रस्त जनों की वेदना को कम किया जा सकता है।

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