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इस भारतीय डॉक्टर ने इजात किया 360 रुपए वाला एंटी रेबीज सीरम, WHO ने दी विश्‍व स्‍तरीय मान्यता

पूरी दुनिया में रेबीज़ से जितनी मौतें होती है उसका 36 फीसदी हर साल भारत में होता है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के अनुसार, हर साल लगभग 15 लाख लोग इसका शिकार होते हैं जिनमें से 90 फीसदी मामले आवारा और पालतू कुत्तों के काटने से होते हैं। भारत में हर 2 सेकेंड में एक व्यक्ति किसी जानवर द्वारा काटे जाने का शिकार बनता है और हर आधे घंटे पर एक व्यक्ति रेबीज की चपेट में आकर मौत के मुंह में चला जाता है।

चिकित्‍सा विज्ञान ने प्रगति के क्षेत्र में हर लाइलाज बीमारी का समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। इसी कड़ी में कुत्तों के काटने पर पेट में लगने वाले महंगे 14 इंजेक्शन के बदले जहां अब इंजेक्शन मांसपेशियों में लगाए जाते हैं वहीं शिमला से एक अच्छी खबर सुनने को मिली है कि हिमाचल प्रदेश के डॉक्टर उमेश भारती ने एंटी रेबीज सीरम बनाया है, जिसकी लागत मात्र 360 रुपए है। सबसे ख़ास बात यह है कि इसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वैश्विक स्तर पर मान्यता भी प्रदान की है।

पागल कुत्ते या बंदर के काटने पर एंटी रेबीज वैक्सीन अब तक मांसपेशियों में लगाई जाती थी, जिसका खर्च लगभग 30 से 35 हजार तक आ जाता है। लेकिन अब डॉक्टर भारती द्वारा विकसित एंटी रेबीज सीरम को मांसपेशियों में न लगाकर सीधे घाव पर लगाया जा सकेगा। यह सीरम घाव में रेबीज वायरस पर हमला करके उसे निष्क्रिय कर देता है। इस कारण इसकी मात्रा भी कम लगती है और यह जल्दी असर भी करता है।

पिछले 17 सालों की मेहनत से डॉक्‍टर उमेश भारती ने इस सीरम को बनाकर पहले बंगलौर के निम्‍हांस से तकनीकी क्लियीरेंस ली उसके बाद 2013 से अब तक 269 मरीजों पर प्रयोग करके सफलता पाई है। इस सीरम को घाव पर लगाने से  मरीज के खून में भी इसका कोई अंश नहीं आ पाता, साथ ही यह घाव को जल्दी ठीक कर देता है।

2008 से पहले तक जानवर के काटने पर पेट के चारों ओर टीके लगते थे। बाद में मांसपेशी में टीका लगाना शुरू किया गया। ऐसा करने से टीके का मूल्य पांच गुना कम हुआ। तब तक बाजार में सीरम आता था, लेकिन अचानक सीरम आना बंद हो गया। इस बीच सीरम की कमी को देखते हुए टीका त्वचा में लगाना बंद कर घाव में लगाने का प्रयोग सफल रहा। घोड़े और इंसान के खून से बनने वाला यह सीरम पहले मांसपेशियों में लगने के कारण दस मिलीलीटर तक प्रयोग होता था वहीं अब घाव पर लगाने के लिए मात्र एक मिलीलीटर की आवश्यकता ही होती है। इसी कारण इसके खर्चे में काफी कमी आई है।

डब्ल्यूएचओ ने इस सीरम को 1 फरवरी को मान्यता प्रदान की है। पिछले 2 सालों में हिमाचल प्रदेश सरकार के दस हजार करोड़ रुपए बचाकर विश्व स्तरीय प्रयोग के लिए भी यह एंटी रेबीज सीरम उपलब्ध होने जा रहा है। हिमाचल प्रदेश के अस्‍पतालों में अब तक 15,000 मरीजों को इस तकनीक से सफल इलाज दिया जा चुका है। मेडिकल विज्ञान के क्षेत्र में यह एक क्रांतिकारी खोज है।

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