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रिटायरमेंट के बाद ऐशो-आराम की जिंदगी छोड़ जरूरतमंदों की सेवा में अपना जीवन न्योछावर कर दिया

इस दुनिया में सबकुछ सिर्फ खुद के लिए नहीं होता। हम प्रकृति से ही एक उदाहरण ले लेते हैं, प्रकृति अपने लिए कुछ भी नहीं करती है जैसे नदियाँ कभी अपना पानी नहीं पीती है, पेड़ कभी फल नहीं खाते हैं, सूरज कभी अपने आप को गर्मी या रोशनी नहीं देता है, तो इंसान को भी इनसे सीख लेते हुए दूसरों के लिए कुछ-न-कुछ करना चाहिए तभी सही मायने में जिंदगी परिभाषित होगी।

अपनी नौकरी से रिटायरमेंट के बाद अक्सर लोग ऐशो-आराम भरी ज़िंदगी जीना चाहते हैं। लोग चाहते हैं कि बाकी के जीवन वे सुखपूर्वक व्यतीत करें। पर हम खुद के सुख प्राप्ति के बजाय अगर दूसरों के दुःखों को कम कर सकें तो कितना बेहतर होगा। अगर हमारे एक पहल से दूसरों के चेहरे पर एक छोटी सी भी मुस्कान आ सके तो वह हमारे लाख सुख-सुविधाओं से बेहतर होगा।

आज हम एक ऐसे ही दंपत्ति से रूबरू करा रहे हैं, जिन्होंने रिटायरमेंट के बाद ऐशो-आराम भरी ज़िन्दगी जीने के बजाय सामाजिक कार्यों को चुना।

वेंकट अय्यर और विजया अय्यर मूलतः कर्नाटक के बेंगलुरु के रहने वाले हैं। लेकिन लंबे समय से दोनों ओमान की राजधानी मस्कट में रहते थे। अय्यर दंपत्ति मस्कट में ही जॉब करते थे। रिटायरमेंट के बाद उनके पास बहुत सारे रास्ते थे, वे चाहते तो सुकून और आराम भरी ज़िन्दगी जी सकते थे। पर उन्होंने भारत लौट कर जरूरतमंदों की मदद करने का फैसला लिया। अय्यर दंपत्ति के मन में विचार आया कि उन्होंने अपनी सारी उम्र काम करने व पैसा कमाने में लगा दी। अब उन्हें अपना जीवन भलाई के कामों के लिए समर्पित करना चाहिए।

चुकी पहले उन्हें इसका कोई अनुभव नहीं था, इसलिए अय्यर दंपत्ति को पता नहीं था कि वे इस काम को कैसे शुरू करें। इसलिए उन्होंने मस्कट के ही एक एनजीओ के लिए वॉलेंटियर में रूप में काम करना शुरू किया। वह दोनों नें लोगों की मदद के लिए बहुत सारे कामों में सहयोग किया। साथ ही साथ इसकी पूरी प्रक्रिया को भी जाना। उन्होंने वहां एक साल काम किया। इस एक साल के दौरान ही उन्होंने महिलाओं और बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था। अच्छा खासा अनुभव प्राप्त करनें के बाद आज से करीब 10 वर्ष पहले 2007 में अय्यर दंपत्ति भारत आ गए।

बेंगलुरु आने के बाद अय्यर दंपत्ति ने देखा कि महिलाओं और बच्चों के लिए तो कई अनाथालय मौजूद थे। बहुत सारी संस्थायें भी अनाथों के लिए काम करती है। पर बहुत सारी ऐसी महिलाएं होती हैं, जिनको उनके पति मार-पीट कर घर से निकाल देते हैं। कई बार उनके साथ छोटा बच्चा भी होता है। ऐसे में उस अकेली माताओं और उनके बच्चों के लिए कोई ऐसी सुविधा नहीं होती। उन्हें दर-दर भूखे-प्यासे भटकना पड़ता है। अनाथालयों ने ऐसे बच्चों को रखने से भी मना कर दिया था, जिनके माता-पिता ज़िंदा होते हैं। ऐसे में महिलाओं को मज़बूरी में गलत काम भी करने पड़ जाते हैं और उस बच्चे का जीवन भी अंधकार में चला जाता है। अय्यर दंपत्ति ने इसे गंभीरता से लेते हुए इसपर काम करना शुरू किया।

इस समस्याओं के निदान हेतु अय्यर दंपत्ति ने 2007 में स्वाभिमान एनजीओ को स्थापित किया। इस एनजीओ के तहत इस तरह की समस्या से परेशान महिलाओं और उनके बच्चों को मदद दी जाती है। वेंकट और विजया ने झुग्गियों मे रहने वाली 3 से 5 साल की ऐसी 15 बच्चियों को चुना जिसके पिता नहीं हैं और उसकी माँ पालनें व पढ़ाने में सक्षम नहीं थी। उन्होंने ऐसी बच्चियों को एनजीओ के साथ जोड़ा। एनजीओ में आने के बाद ये सभी बच्चियों को अच्छी शिक्षा, उनको पौष्टिक भोजन, अच्छे कपडे और खेलने की भी व्यवस्था की गयी। इन बच्चों की मां को इनसे मिलने दिया जाता था और छुट्टियों के समय बच्चों को उनके घर भी भेजा जाता है।

इसके अलावा भी वेंकट और विजया नें झुग्गियों में रहने वाले अन्य ज़रूरतमंद बच्चों की मदद भी की, जो पढ़ने में अच्छे थे। पर पैसे के अभाव में शिक्षा हासिल नहीं कर पा रहे थे। अय्यर दंपत्ति ने अकेली ऐसी महिलाओं के स्वरोजगार और स्वाभिलंबन के लिए भी सराहनीय कार्य किये। उन्होंने ऐसे लघु उद्योग के यूनिट लगवाये जहाँ महिलाओं को काम दिया जाता है। उन्होंने एक छोटी सी बैग मेकिंग व पैकिंग यूनिट खोली, जहाँ पर 30 से ज़्यादा महिलाओं को रोज़गार मिला है। यहाँ महिलायें हाथों से बैगों की सिलाई करती हैं और फिर इसे मार्केट में सप्लाई कर दिया जाता है। स्वाभिमान संस्था से जुड़े ज्यादातर लोग झुग्गी-झोपड़ियों के ही रहने वाले हैं। उन्हें संस्था की ओर से मुफ़्त भोजन और मेडिकल सुविधाओं की भी व्यवस्था की जाती है।

अय्यर दंपत्ति द्वारा समाज के हित के लिए किये जा रहे कार्य सच में सराहनीय हैं। अगर हर व्यक्ति वेंकट अय्यर और विजया अय्यर से प्रेरणा लेकर खुद के अलावा पूरे समाज के बारे में सोचे तो समाज में एक अकल्पनीय बदलाव संभव है।

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