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इस शख्स की एक याचिका ने सरकार को रेप के दोषियों के खिलाफ़ कानून को सख्त करने के लिए किया विवश

आए दिन रेप की कई घटनाएं सुनने को मिल रही है और ज़्यादातर घटनाओं में नाबालिगों के साथ ही बलात्कार का मामला सामने आ रहा है। सुबह अखबार खोलो या न्यूज़ चैनल हर जगह बलात्कार और यौन शोषण की ख़बरें तो मानों आम हो गयी है। छोटी-छोटी बच्चियों के साथ हो रहे इस जघन्य और आमानवीय घटनाओं को सुनने मात्र से दिल सिहर उठता है। तो ज़रा सोचिए उन मासूमों को किस पीड़ा और नारकीय अवस्था से गुजरना पड़ता होगा। हाल ही में कठुआ और उन्नाव आदि में नाबालिगों के साथ हुए बलात्कार की घटनाएँ पूरा देश को शर्मसार कर देने वाली है। नाबालिग बच्चियों के साथ रेप की घटनाओं ने एक तरफ जहाँ देश को झकझोर कर रख दिया है। वहीं दूसरी तरह हमारी कानून एवं न्याय व्यवस्था पर सवालिया निशान भी खड़ा किया है।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के एक वकील नें नाबालिगों के साथ रेप करने वालों को सख़्त से सख़्त सजा दिलवाने के लिए एक बड़ी लड़ाई लड़ी है। उनकी मांग थी कि बच्चों के साथ बलात्कार के दोषियों को फांसी की सज़ा सुनाई जाए। सुप्रीम कोर्ट में उनके द्वारा दायर जनहित याचिका को मंजूर कर लिया है।

उसके बाद कैबिनेट की बैठक में भी ‘प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस’ यानी “पॉक्सो एक्ट” में संशोधन को मंजूरी मिल गयी। अब 12 साल से कम उम्र के बच्चों से रेप के दोषियों को मौत की सजा दिए जाने का रास्ता साफ हो गया है। जानिए कौन है यह वक़ील जिनकी पहल के बाद यह संभव हो पाया है।

दिल्ली के अलख आलोक श्रीवास्तव पेशे से सुप्रीम कोर्ट के वकील हैं। उनकी एक पहल के बाद अब रेप के खिलाफ मौजूदा कानून को एक बल मिलेगा। दरअसल जनवरी में 8 महीने की बच्ची के साथ रेप के एक मामले में वकील आलोक श्रीवास्तव द्वारा एक याचिका दाखिल की गई थी। जिसमें उन्होंने यह दलील दी थी कि पोक्सो ऐक्ट में बदलाव होना चाहिए और 12 साल तक की बच्ची के साथ रेप के मामले में फांसी तक की सजा का प्रावधान होना चाहिए। इस मामले में कानून मंत्रालय व महिला एवं बाल विकास मंत्रालय को प्रतिवादी बनाया गया था। उनकी मांग के फलस्वरूप प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस’ यानी “पॉक्सो एक्ट” में संशोधन को मंजूरी मिल गयी।

जिसके बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक हुई और फैसला लिया गया कि अब न्यायपालिका 12 साल से कम उम्र के बच्चों के साथ दुष्कर्म या यौन उत्पीड़ित के दोषियों को मौत की सज़ा सुना सकती है। साथ ही, इस क़ानून के तहत अब 16 साल की उम्र से कम की बच्ची के साथ रेप के मामलों में दोषी को सज़ा की न्यूनतम अवधि को 10 वर्ष से बढ़ा कर 20 वर्ष कर दिया गया है। महामहिम राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी दोषियों को मृत्युदंड के प्रावधान वाले आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश, 2018 को कानून की शक्ल दी है।

“छोटे मासूम बच्चों के साथ दुष्कर्म करने वाले दरिंदों को सीधे मौत की सजा होनी चाहिए।” आलोक श्रीवास्तव को यह ख्याल तब आया, जब उन्होंने अखबार में पढ़ा कि दिल्ली में 28 साल के एक युवक ने अपनी ही चचेरी बहन के साथ बलात्कार की वारदात को अंजाम दिया है। वह यह पढ़ कर सन्न हो गए कि उस मासूम की उम्र मजह आठ महीने की थी। आलोक को इस बात ने अंदर तक झकझोर दिया, वो फौरन बच्ची को देखने के लिए पहुंचे। पता चला कि मासूम के माता-पिता गरीब मजदूर थे और उनके पास बच्ची के इलाज के लिए पैसा भी नहीं थे। तब उन्होंने ऐसे जघन्य अपराध के लिए फांसी की मांग वाली एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की। सुप्रीम कोर्ट ने आलोक की याचिका पर संज्ञान लिया और मेडिकल बोर्ड गठित कर बच्ची की जांच कराने के आदेश दिए। कोर्ट ने प्रशासन को यह निर्देश भी दिया कि बच्ची का पूरा इलाज करवाए।

आलोक ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से लॉ की पढ़ाई साल 2012 में पूरी की। वे अपने बैच के गोल्ड मेडलिस्ट रह चुके हैं। साल 2012 में दिल्ली विश्वविद्यालय के कैंपस लॉ सेंटर में आयोजित दीक्षांत समारोह में पूर्व मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया ने अलख आलोक श्रीवास्तव को गोल्ड मेडल से सम्मानित किया। इस दौरान जस्टिस कपाड़िया ने उनकी तारीफ की और कहा कि तुम जैसे युवाओं को समाज के लिए आगे आना चाहिए और न्याय के लिए लड़ना चाहिए। एडवोकेट आलोक लॉ करने के बाद हिंदुस्तान पेट्रोलियम में सरकारी नौकरी भी की। इसके अलावा भी पहले वे बहुत सारे कंपनियों के लिये काम कर चुके है । लेकिन साल 2014 में उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी को छोड़ वकालत की प्रैक्टिस करने का मन बनाया। उनके इस फैसले से उन्हें दोस्त तथा घर वाले सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि क्यों अच्छी ख़ासी नौकरी को छोड़ इस चक्करों में पड़ रहे हो। पर आलोक ने समाज की बुराईयों के खिलाफ लड़ने के अपने फैसले से पीछे नहीं हटे।

आलोक खुद दो बच्चियों के पिता है, इस लिए वे इन विषयों के प्रति अधिक संवेदनशील नज़र आते है। सिर्फ इसी मामले में नहीं इससे पहले भी अक्सर वे बच्चियों के साथ यौन शोषण और उत्पीड़न के मामलों के ख़िलाफ अपनी आवाज़ बुलंद करते रहे हैं।

आलोक  चाहते थे अपनी अच्छी-ख़ासी मोटी तनख्वाह वाली नौकरी में आराम से जिंदगी का मज़ा ले सकते थे लेकिन उन्होंने समाज में व्याप्त बुराईयों को कानून के माध्यम से खत्म करने का बीड़ा उठाया। ऐसी सोच में ही असल मायने में हिन्दुस्तान को महाशक्ति बनाने की ताकत होती है।

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