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बिहार के एक युवा शिक्षक की कहानी जिन्हें शिक्षा के क्षेत्र में मलाला के साथ मिला काम करने का मौका

व्यक्तित्व के विकास में शिक्षा एक सबसे महत्वपूर्ण घटक है। यह हमारे लिए दुनिया के दरवाजे खोलती है और विभिन्न क्षेत्रों से ज्ञान समेट कर लाता है। शिक्षा विभिन्न संस्कृतियों, लोगों, परंपराओं, विज्ञान आदि को भी समझने में हमारी सहायता करती है। इस प्रकार हमें शख्सियत बनाने का श्रेय हमारे शिक्षकों को जाता है।

शिक्षक हमारे समाज के मजबूत स्तम्भ हैं। वे बचपन से ही हमारे जीवन को प्रभावित करते हैं और विभिन्न तरीके से हमारी धारणाओं को आकार देते हैं। वे हमारी दृष्टिकोण को विस्तृत बनाते हैं और हमें एक सिमित सीमा से बाहर जाने और जागरूकता फैलाने के लिए प्रेरित करते हैं। कार्पोरेट जॉब के अनुलाभों को छोड़कर शिक्षण के क्षेत्र को चुनने वाले सत्यम मिश्रा, शिक्षक के रुप ऐसा ही योगदान कर रहे हैं।

बिहार के भागलपुर जिले के मूल निवासी 26 वर्षीय सत्यम शिक्षित परिवार वाले पृष्ठभूमि से है। इससे उनमें कम ही उम्र में ही शिक्षा के महत्व का विकास हुआ। उनके पिता गणित में स्वर्ण पदक प्राप्त किया है और कैसे वह लोक निर्माण विभाग के क्लर्क से ग्रामीण बैंक के मैनेजर पद तक पहुंचे, वह सत्यम के लिए प्रेरणा बना। वे अपने चाचा से काफी प्रभावित थे, जो प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी के लिए एक कोचिंग संस्था संचालित करते हैं। जब सत्यम ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और उन्हें कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ाने का प्रस्ताव मिला तो उन्होंने तुरंत सहमति व्यक्त की।

संस्थान में पढ़ते समय ही सत्यम को उस स्कूल में पढ़ाने के लिए एक प्रस्ताव मिला, जहां से उन्होंने अपनी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी की थी। उन्हें यह रोचक लगा और उन्होंने माध्यमिक कक्षाओं में भी पढ़ाने का अनुरोध किया। उन्होंने जूनियर छात्रों को पढ़ाने के लिए इसलिए जोर दिया क्योंकि अपने चाचा के संस्थान में पढ़ाते हुए उन्होंने एक बहुत ही गहरा निरीक्षण किया था।

सत्यम ने देखा कि गणित और अंग्रेजी में कुशल छात्र प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में बेहतर प्रदर्शन करते हैं। गणित, लगभग सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में आम है। जिसमें अन्य विषयों की तुलना में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता होती है। इस बात ध्यान में रखते हुए, उन्होंने हाई स्कूल के छात्रों के लिए एक गणित का मॉडल तैयार करने का निर्णय लिया।

अपने मॉडल का परीक्षण करने के लिए, 2015 में वे टीच फॉर इंडिया, पुणे से जुड़े। जब उन्होंने अपनी योजना को परिप्रेक्ष्य लाया तो आश्चर्यजनक रूप से उन्होंने पाया कि अंकों के 100 पैमाने पर छात्रों के प्रदर्शन में 58 अंकों से 80 अंकों के बड़े स्तर पर सुधार हुआ है। केवल 18 महीनों में 22 अंकों की वृद्धि हुई और अगले कुछ महीनों में उनके 80% छात्रों ने डिस्टिंक्शन के साथ परीक्षाएं पास की।

सत्यम कहते हैं, “हमारे जैसे देश में, जहाँ 5 करोड़ लोग जिनकी उम्र 25 वर्ष से कम हैं, उच्च विद्यालय गणित के लिए एक मॉडल विकसित करने से आने वाले वर्षों में एक बड़ा अंतर आ सकता है।”

2016 के गर्मियों में जब वे टीच फाॅर इंडिया के साथ जुड़े उसी दरम्यान उन्हें आईआईएम अहमदाबाद के स्माईल (SMILE) सेन्टर में प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिला। यह उनके लिए एक बड़ा अनावरण था। यहाँ उन्हें कई अंतरराष्ट्रीय स्कूलों के बारे में पता चला जो युद्ध क्षेत्रों में काम कर रहे थे। सत्यम, जो हर दिन समाचारों की जानकारी रखते थे, सीरिया की स्थिति को अच्छी तरह जानते थे। उन्हें एहसास हुआ कि विश्व तीसरी युद्ध के कगार पर था और इस सोच ने उन्हें बेचैन कर दिया।

जब सत्यम ने लेबनान जाने और नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई द्वारा स्थापित विद्यालय में पढ़ाने का मौका सुना, तो उन्हें बेहद प्रसन्नता मिली।

“मलाला ने शिक्षा के लिए उसके सिर में एक गोली खाई। उसने अपने 18वें जन्मदिन पर सीरियाई-लेबनान की सीमा के पास शरणार्थी शिविरों में सीरियाई शरणार्थी लड़कियों के लिए दो स्कूल शुरू कर दिए”, उन्होंने केनफ़ोलिओज़ को उनके साहस की प्रशंसा करते हुए बताए।

सीरियाई शरणार्थी लड़कियों को शिक्षित करने के लिए स्कूल शिक्षा के अपने उद्देश्य के लिए इतने समर्पित और प्रतिबद्ध हैं कि वे कसम खा रखे है कि युद्ध समाप्त होने के दिन वे स्कूल बंद करेंगे। यह समर्पित टीम छुट्टियों पर भी काम करती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त हो। यह कानों को सुन्न बना देने वाली अराजकता के बीच एक छोटा सा स्वर्ग था।

शिक्षण के क्षेत्र में सत्यम का इतना प्रभावशाली योगदान था कि उन्हें अमेरिकन यूनिवर्सिटी आॅफ बेरुत में आमंत्रित किया गया ताकि वे वहाँ के स्वयंसेवकों को प्रेरित करें।

सत्यम, मलाला के स्कूलों में सीरियाई शरणार्थी बच्चों को पढ़ाने वाले पहले भारतीय शिक्षक थे। अमेरिकन यूनिवर्सिटी आॅफ बेरुत में, लेबनान के एक छात्र, री हलाल ने उनसे बात की शुरुआत में एक सवाल पूछा, “क्यों सीरियाई बच्चे और क्यों लेबनान, जब भारत में बहुत कुछ करने के लिए है?”

प्रश्न का उत्तर देने के लिए उन्होंने सीरिया के युद्ध के दौरान की एक तीन साल की सीरियाई बच्चे की तस्वीर दिखायी, जो युद्धग्रस्त सीरिया से भागने की कोशिश करते हुए भूमध्यसागर में डूब गई थी। दूसरा एक वीडियो था जिसे देख कर स्वयंसेवकों की पूरी टीम आँसुओं में डूब गई। यह वीडियो, सीरिया में बम विस्फोट से बचने वाला बच्चा, ओमरेन दक्नेश्शे का था।

सत्यम ने आगे कहा, “आज, अमेरिकी वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 23% नियंत्रण करता है और यह सबसे शक्तिशाली राष्ट्र है। लगभग 1,700 वर्षों में से, भारत ने औसतन वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 25-30 प्रतिशत नियंत्रित किया।” उन्होंने अमेरिकी यूनिवर्सिटी आॅफ बेरुत में छात्रों को बताया कि यह वह धरती है जहाँ से वे आए हैं और यह भारत को एक देश के रुप में देखने की बजाय एक संस्कृति के रूप में देखने का वक्त है।

एक शिक्षक के रूप में उनकी यात्रा अभी भी जारी है और अपने विनम्र स्वभाव और अभिनव तरीकों से, सत्यम कई बच्चों के जीवन को संवारने में मददगार की भूमिका निभा रहे हैं और ऐसा करने का उन्होंने ठान रखा है। भविष्य में, वे यात्राएं करना चाहते हैं, और एक ऐसे उद्यमी बनने की चाहत रखते हैं जो कि हाशिए पर खड़े वर्गों के बच्चों की मदद कर सकें और शिक्षा के माध्यम से जागरूकता फैलाकर एक क्रांति लाये।

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