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एक ऐसे IPS ऑफिसर जो रिटायरमेंट के बाद गरीब छात्रों को निःशुल्क शिक्षा देकर भेज रहे हैं IIT

रिटायरमेंट के बाद सामान्य धारणा जीवन भर की भागदौड़ और काम-काज की थकान को कम करने के लिए, आराम करने की होती है। लेकिन “जर्नल ऑफ गेरोंटोलॉजी: साइकोलॉजिकल साइंस” के अंक में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार रिटायरमेंट के बाद ज्यादा आराम करने पर आपके दिमाग पर बुरा असर पड़ सकता है। इसलिए रिटायरमेंट के बाद खाली समय में अपनी रुचि से जुड़े काम-काज करने चाहिए। और जब यह काम शिक्षा के क्षेत्र में किया जाए तो अवकाश प्राप्त व्यक्ति की क्षमता और अनुभव हमारे देश में व्याप्त अशिक्षा और गरीब एवं वंचित वर्गों से दूर होती महंगी शिक्षा पद्धति को आसान और सर्वसुलभ बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

आइजी अंकल के नाम से मशहूर बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद एेसा ही एक प्रसंशनीय प्रयास कर रहे हैं बच्चों को पढाना और आईआईटी, मेडिकल, लाॅ, लोक सेवा आयोग और अन्य पाठ्यक्रम तथा परीक्षाओं की तैयारी के साथ-साथ खेल कूद के क्षेत्र में भी युवाओं को तैयार करते है। शिक्षा और प्रशासन दोनों क्षेत्रों में अभिनव प्रयोग के लिए मशहूर अभयानंद की संस्थान वंचित तबके के मेधावी छात्रों को प्रशिक्षण देती हैं। प्रति वर्ष जेईई एडवांस, मेडिकल और कई अन्य परीक्षाओं में अभयानंद सुपर-30 के छात्र सफलता के परचम लहराते हैं। अभयानंद सुपर-30 की शाखाएं आसाम से लेकर राजस्थान तक और श्रीनगर से लेकर महाराष्ट्र और देश के कई भागों में चला रहे हैं। जिसमें हर वर्ष कई छात्र शामिल होते हैं।

वे कहते हैं जब बच्चों का रिजल्ट आता है तो उनको ऐसी खुशी महसूस होती है जैसे उनका खुद का रिजल्ट आया हो। अभयानंद का शगल है- पढ़ाना। उन्हें अच्छा लगता जब बच्चे पहले प्रयास में आईआईटी क्रैक कर लेते हैं। रिटायरमेंट के बाद वे अपना पूरा समय बच्चों को पढ़ाने पर देते हैं। बच्चों को उन्होंने अपना मोबाइल नंबर तक दिया हुआ है। छात्र जब चाहें प्रॉब्लम पूछ सकते हैं। 2003 में शुरु की गई उनके सुपर 30 के लिए प्रवेश परीक्षा ली जाती है। सफल छात्रों को आवासीय शिक्षा दी जाती है, जहाँ रहना-खाना सब निःशुल्क होता है।

केनफ़ोलिओज़ से खास बातचीत में उन्होंने कहा, “मैं इसमें अपना समय और इल्म लगाता हूँ। मेरे पास पैसे नहीं हैं न मैं लगाता हूँ।” समाज के लोगों से उनका अनुरोध होता है कि वे आगें आएं इसमें पैसे लगाएं। इसमें आपके बच्चे नहीं पढ़ेंगे न आपको किसी प्रकार का आर्थिक लाभ होगा। परंतु समाजिक विकास के वर्तमान दौड़ में पिछड़े और वंचितों की मदद होगी। अलग-अलग सेंटर की फंडिंग अलग-अलग माध्यमों से होती है। कुछ केन्द्र को कॉर्पोरेट फंडिंग होती है जबकि कुछ सामूहिक और सामाजिक सहयोग से चलते हैं। उन्होंने कहा, “मेरा कार्य पढ़ाने का है। कैसे पढ़ाना और कैसे गाईड करना है वह मेरा निर्णय होता है और हर वर्ष हम अपनी संस्था का सोशल आॅडिट जारी करते हैं।”

झारखण्ड के देवघर जिले में जन्मे अभयानंद 1977 बैच के आईपीएस अधिकारी और शिक्षाविद् हैं जिन्होंने गरीब छात्रों को आईआईटी जेईई की परीक्षा की तैयारी के लिए सुपर 30 की अवधारणा तैयार की। अगस्त 2011 में अभयानंद को बिहार राज्य के 48वें डीजीपी के रुप में चुना गया। उनके पिता स्वर्गीय श्री जगदानंद 1955 बैच के IPS अधिकारी थे, जो 1985-86 में बिहार के 28वें डीजीपी रहे। पटना से स्कूलिंग करने के बाद वे पटना साइंस कॉलेज में भौतिकी के टाॅपर रहे। “फिजिक्स के टाॅपर होने के साथ साथ बेस्ट ग्रेजुएट रहा। जो संभवतः अब तक का रिकार्ड है।”, उन्होंने संभवतः पर जोर देते हुए बताया। उनकी पत्नी डॉ नूतन आनंद एक प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं।

वह 2006 में एडीजी (मुख्यालय) थे। उन्होंने शास्त्र अधिनियम के त्वरित सुनवाई का कार्य किया। बिहार सैन्य पुलिस एडीजी के अपने कार्यकाल के दौरान, उन्होंने पुलिस बल और उनके परिवारजनों के इलाज के लिए एक जीर्ण सरकारी अस्पताल को आधुनिक सुविधाओं के साथ आधुनिक नर्सिंग होम में रूपांतरित करने के लिए अपने वेतन से उदारतापूर्वक दान करने के लिए कॉन्स्टेबलों को प्रेरित किया।

अभयानंद बताते हैं, “14 साल पहले की बात है। जब मेरा तबादला बीएमपी में हो गया था। बीएमपी का स्थानांतरण उस समय ‘शंट’ करना माना जाता था। लेकिन मैंने ऐसा नहीं सोचा। बीएमपी में अपेक्षाकृत व्यस्तता कम रहने की वजह से मैंने अपनी बेटी और बेटे को पढ़ाने में ज्यादा समय देना शुरू किया। फ़िज़िक्स पढ़ाने में मुझे खूब मजा आता था। मेरी बेटी और बेटे ने आईआईटी क्रैक कर लिया। तब मैंने सोचा कि जब अपने बेटे को पढ़ा कर उसे आइआइटी भेज सकता हूं तो अन्य बच्चों को क्यों नहीं पढाकर उन्हें भी आईआईटी पहुंचाऊं?” यहीं से उन्होंने अपनी व्यस्त दिनचर्या से वक्त निकाल कर बच्चों को फ़िज़िक्स पढ़ाना शुरु किया।

1994 से कोचिंग चला रहे आनंद कुमार से उनकी मुलाकात एक मीडिया कार्यालय में हुई। जहाँ आनंद कुछ गणित के प्रश्नोत्तरी के स्तंभ लिखा करते थे। विभिन्न संघर्षों का सामना कर रहे आनंद कुमार की मदद करने और अपने पढ़ाने की रुचि को एक आकार देने के लिए अभयानंद ने उनके सामने कुछ चुने हुए गरीब बच्चों को अपने व्यस्त दिनचर्या से वक्त निकाल कर क्लास देने की बात कही। हालाँकि उन्हें बच्चों को कोचिंग देने का कोई अनुभव नहीं था और खुद के बच्चों को पढ़ाने से यह अलग था। एक प्रयोग के आधार पर उन्होंने आनंद कुमार के सेंटर से प्रारंभ में 30 बच्चों के साक्षात्कार के आधार पर चयन कर उन्हें पढ़ाना शुरु किया। इन बच्चों का साक्षात्कार स्वयं अभयानंद और पहले प्रयास में आईआईटी, दिल्ली के लिए सफल रहे उनके पुत्र ने किया था। यहीं से 2002 में सुपर-30 की अवधारणा की शुरुआत हुई। चयनित छात्रों के लिए निःशुल्क व्यवस्था रामानुजन स्कूल आॅफ मैथेमैटिक्स करती थी। 2003 में पहला बैच आईआईटी में आया और सुपर-30 ने अभूतपूर्व प्रदर्शन ने इसे छात्रों की पहली वरीयता बना दी। यह प्रयास बहुत सफल रहा और आने वाले हर सालों में सुपर-30 के छात्रों ने सफलता के नए आयाम गढ़े।

अभयानंद ने सुपर-30 के माध्यम से पढ़ाने के तरीकों में एक बड़े बदलाव की शुरुआत की। गरीब और क्षमतावान छात्रों के लिए आईआईटी रास्ता आसान बनने लगा और बड़ी संख्या में छात्र क्वालिफाई करने लगे। पढ़ने पढ़ाने के तरीके परिवर्तन के बारे में उनके कुछ पुराने छात्र जो आईआईटी दिल्ली से पढ़ाई पूरी कर अभी एक प्रसिद्ध इंजिनियरिंग संस्था चला रहे हैं उनके अनुसार, आईआईटी की तैयारी गणित, फिजिक्स, कैमेस्ट्री जाननेवाला करवा दे इसकी संभावना कम है। यह एक गंभीर परीक्षा है, जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर 15 लाख अभ्यार्थियों में 5000 का चयन होता है। तीन तीन घंटे की परीक्षा हाॅल का दवाब और परिस्थिति का अनुभव करने वाला ही समझ और समझा सकता है। बाहर आ कर तो हर कोई प्रश्न हल कर सकता है। परंतु यह करामात परीक्षा हाॅल में कर पाना सबके बुते की बात नहीं होती। यह सिर्फ वह बता सकता है जो उस कठिन डगर से गुजरा है। एक गलती आपको लाखों स्तर नीचे लाकर रेस से बाहर कर देती है। इसके लिए ऐसे शिक्षक की अावश्यकता है जो मानसिक रुप से आपको ऐसा तैयार कर सके कि परीक्षा हाॅल के अन्दर आप सवाल हल कर सकें।

अभयानंद का मानना है, “जिन्होंने कभी राष्ट्रीय स्तर की किसी प्रतियोगी परीक्षा में न सफलता हासिल की और न ही शामिल हुए हो उनके लिए छात्रों की मनोदशा को गढ़ पाना कठिन है और यही कारण है कि छात्रों को सिर्फ किताबी ज्ञान देने से आशातीत सफलता नहीं मिल पाती।”

“प्रैक्टिस, टेस्ट एण्ड डिस्कस” को सफलता की कुंजी मानने वाले अभयानंद ने परीक्षा के वास्तविक परिस्थिति की स्थिति में महौल बना कर टेस्ट लेने की प्रक्रिया प्रारंभ की। परिस्थिति का विश्लेषण और कमजोर पक्ष पर काम कर छात्रों को मनोवैज्ञानिक और विषयात्मक रुप से मजबूत बनाया। विषय को जानना और जान कर नहीं भी नहीं कर पाना एेसी मनोदशा से निकालने के लिए उन्होंने कई प्रयोग कर छात्रों को तैयार किया। किम हर्टमैन की पुस्तक ‘टू सेकेण्ड एडवांटेज’ का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, “यह हाॅकी और क्रिकेट खेल के मैदान में खेलने जैसा है। जहाँ सेकेण्ड के कुछ भाग में कैसा शार्ट खेलना होता है यह निर्णय करना होता है। और हर दिन का सतत अभ्यास ही उस हालात के लिए आपको परिपक्व बना सकता है। राष्ट्रीय स्तर की इस परिक्षा के लिए सिर्फ ज्ञान होना आवश्यक नहीं।”

उन्होंने बताया, “मैं चाहता था यह सामाजिक प्रयोग समाज के बीच आए। इसमें सामाजिक और भौगोलिक रुप से व्यापकता आनी चाहिए थी। यह सिर्फ आईआईटी कोचिंग तक सीमित न रहें बल्कि हर क्षेत्र में गरीब बच्चों को फायदा दे और समाज के लोग मिलकर कुछ करें और यह पूरे देश में फैले। यह किसी शहर या परिवार में सीमित नहीं रहे, मैं यह नहीं चाहता था और न ही यह चाहता था कि इससे कोई आर्थिक लाभ उठाना शुरु करे यह भी मेरी इच्छा थी सुपर-30 से।”

ऐसे ही कुछ वैचारिक कारणों से 2007 में अभयानंद, आनंद कुमार से अलग हो गए और इसी साल आइजी अंकल के पढाने के जुनून के कारण ही अभयानंद सुपर 30 की आधारशिला पड़ी।

“सुपर-30 एक बहुत बड़ा सामाजिक प्रयोग है। जिससे कई सामाजिक समस्याओं का सामाधान स्वयं हो सकता है। यह सिर्फ आईआईटी कोंचिंग ही नहीं बल्कि अनेको अनेक क्षेत्र में प्रसार कर सकता है। समाज अपनी समस्याओं का निदान स्वयं तलाश कर रहा है और कर सकता है। सुपर-30 का यही मकसद है।”

अभयानंद का मानना है कि हर समाज के लोग यह कोशिश कर रहे हैं बच्चे पढ़ें। उन्हें यह समझ में आ गया है कि यह सरकार के बूते की बात नहीं। समाज की मदद से ही आंकड़ा बढ़ रहा है। उन्होंने बताया, “नकस्ल प्रभावित क्षेत्रों के कई छात्र आज आईआईटी एनआईटी में पहुंच गाए हैं। उस क्षेत्र के बच्चों ने सोंचना शुरु कर दिया कि बन्दूक उठाने से उन्हें कोई लाभ नहीं। वे पढ़ कर एक तरक्की करने का सोचने लगे। इस प्रकार सुपर-30 सोच बदलने का प्रयास है। जिसे समाज ने किया है।”

रिटायरमेंट के बाद उन्हें राज्य के एक बड़े दल के कद्दावर नेता से राजनीति में आने का प्रस्ताव भी मिला परंतु उनकी यह सोच है कि वर्तमान राजनीति की मौलिक प्रक्रिया से सामाजिक परिवर्तन संभव नहीं है। “एक तपस्वी ही परिवर्तन कर सकता है। तपस्वी ही समाज को देने की क्षमता रखता है। मुझे इस समाज को एक नई सोच देना है

बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद के जीवन पर फिल्मकार सुजीत के सिंह ‘अभयानंद इज द कॉप विथ चॉक’ नामक डॉक्यूमेंट्री फिल्म का निर्माण कर रहे हैं। भागलपुर के अभिनेता हिमांशु अभयानंद का रोल निभा रहे हैं। सुजीत ने कहा कि अभयानंद ने डीजीपी रहते कई महत्वपूर्ण काम किए जिसे भुलाया नहीं जा सकता है। ‘सुपर थर्टी’ के संस्थापक अभयानंद ने डॉक्यूमेंट्री बनाए जाने पर खुशी जाहिर की है।

उनका कहना है, “अपनी शक्ति को पहचाने, वह आपके अन्दर है, उसे उभारें। बाहर उसे ढूँढने से कुछ हासिल नहीं होगा। आपकी स्वयं की शक्ति ही आपके लिए रास्ता बनाएगी।”

पढाने का जुनून हो, कुछ अलग करने का जुनून हो तो वक्त की कमी तो बस बहाना है। बिहार के लिए अभयानंद एक गौरव है जिनसे बिहार और बिहारी का नाम रौशन है। रिटायरमेंट बाद इस तरह समाज की सेवा के लिए यदि लोग आएंगें तो यह उनके स्वयं के लिए और देश के लिए भी आनेवाले एक सुनहरे बेहतरीन कल का निर्माण होगा।

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