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जुनून और कर्मठता से इस लड़की ने कुछ ऐसा कर दिखाया कि आज पूरा गाँव मना रहा है जश्न

“मैं एक ऐसे छोटे गाँव से हूं जहां बचपन में मैं आकाश में हवाई जहाज देखकर खुशी महसूस करती थी। किन्तु अब जो आनंद मैंने नासा के साथ काम करके और 17 घंटे की उड़ान में पाया है, वह शब्दों में बयां नहीं हो सकता”, आशना सुधाकरण कुछ ऐसा महसूस करती हैं, जिन्हें ‘द स्पेस गर्ल’ नाम से जाना जाता है।

3 महीने NASA के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर (GSFC) में प्रशिक्षण लेने वाली आशना भारत के लिए एक नायाब हीरा हैं। यद्यपि उनकी कहानी किसी काल्पनिक कथा की तरह लगती है मगर उनकी कामयाबी को देखकर यह मानना ही होगा कि दुनिया में सब कुछ संभव है यदि आप उसके प्रति जोश रखते हैं और कठोर मेहनत करते हैं।

1 मई 1959 को स्थापित GSFC, NASA के पहले अंतरिक्ष उड़ान केंद्र में एक प्रमुख अंतरिक्ष अनुसंधान प्रयोगशाला है। यहां लगभग 10,000 सिविल कर्मचारी और ठेकेदार कार्यरत हैं। यह यूनाइटेड स्टेट्स में अवस्थित है।

कोझिकोड के एक छोटे से गाँव कोदुवाल्ली के एक किसान परिवार में जन्मी आशना ने जो उपलब्धि प्राप्त की है वह कई वैज्ञानिकों का सपना होता है। और यह उनके कठिन परिश्रम और कर्मठता का परिणाम है। उन्होंने सरकारी विद्यालय में पढ़ाई की परंतु वह अपने शैक्षणिक प्रदर्शन के प्रति कभी गंभीर नहीं थी। काॅपी पन्नों पर लकीरें खींचने के मुकाबले उनका अधिक वक्त उपन्यास और कविताएँ पढ़ने में बीता।

डाॅ. एपीजे अब्दुल कलाम और कल्पना चावला के प्रति आशाना की विशेष श्रद्धा रही है और यही कारण है कि आज वह इस मुकाम पर हैं। जब वह 9वीं की छात्रा थीं उस वक्त कोलंबिया शटल दुर्घटना में कल्पना चावला की मृत्यु हो गई थी। एक ओर तो इस घटना ने किशोरी आशना को झकझोर कर रख दिया तो वहीं दूसरी ओर उनमें कल्पना चावला के पदचिह्न पर चलने की प्रेरणा और महत्वाकांक्षा जागृत कर दी।

आशना, कल्पना चावला के प्रभावशाली मुस्कान से सम्मोहित थी। वह हमेशा उनकी एक तस्वीर अपने साथ रखती थी और फिर बाद में उन्हें अपने दोस्तों के बीच ‘द स्पेस गर्ल’ का नाम मिला। वह चमकते तारों और दूर ग्रहों के राज़ खोलना चाहती थी। वे अंतरिक्ष के प्रति बहुत जिज्ञासु रहीं।

जब वह 10वीं में पहुंची तो उन्होंने डाॅ. कलाम का भाषण सुना। भौतिक विज्ञान से स्नातक करने के बाद वे परास्नातक की अपनी पढ़ाई के लिए उसी काॅलेज में गई जहाँ से डाॅ. कलाम ने पढ़ाई की थी।

अपने प्रशिक्षण के लिए आशना ने विक्रम साराभाई स्पेस सेन्टर में आवेदन दिया मगर वहां उन्हें नामंज़ूर कर दिया गया। फिर भी उन्होंने अपनी कोशिश को जारी रखा और काफी प्रयासों के बाद उनका चुनाव कर लिया गया क्योंकि उन्होंने अन्य प्रमाण पत्रों के साथ-साथ अपनी दिलचस्पी बताते हुए एक बहुत ही प्रभावशाली पत्र लिखी थी। उन्होंने गुरुत्वाकर्षण और आयनमंडल की भौतिकी पर काम करना शुरू किया और इससे उनके शोध कार्यों में दिलचस्पी को और प्रेरणा मिली।

इसके बाद आशना कोडैकनाल स्थित 100 साल से भी अधिक पुराने सोलर भौतिकी वेधशाला में गई। अंतरिक्ष विज्ञान की जिज्ञासा के उत्साह में आशना पूरे भारत में कहीं भी आयोजित होनेवाले सम्मेलनों और संगोष्ठियों में अवश्य ही भाग लेती।

“मैं शैक्षणिक रुप से बहुत तीव्र नहीं थी। मैं अपने जुनून से आगे बढ़ रही थी। कभी-कभी मैं बहुत हतोत्साहित हो जाती थी, तब मेरे साथी शोधकर्ता कहते कि विज्ञान की दुनिया में बुद्धिमत्ता के साथ-साथ जुनून दोनों की जरूरत है और मुझे कभी भी जोश खोने के लिए नहीं कहते और न मैंने जोश कम किया”, उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया।

एक दिन इंटरनेट पर प्रशिक्षण और सम्मेलनों के बारे में जानकारी देखते हुए आशना को NASA के स्पेस स्कूल आॅफ महाराष्ट्र के बारे में पता चला। 15 दिनों के कार्यक्रम के तहत वह वहां जुड़ी और उन्हें NASA के कई वैज्ञानिकों के साथ बातचीत के अवसर प्राप्त हुए और वह वहां कई व्याख्यानों में भी शामिल रहीं।

इसी वक्त में उन्हें NASA द्वारा प्रस्तावित विजिटिंग स्काॅलर प्रोग्राम SCOSTEP के बारे में पता चला। आशना को इसमें होने की बहुत उम्मीद नहीं थी क्योंकि इस कार्यक्रम में प्रतिवर्ष सिर्फ 4 लोग ही चुने जाते हैं। “प्रोग्राम के तहत नवोदित वैज्ञानिक और स्नातको को सोलर-ट्रांजिशनल फिजिक्स प्रयोगशाला में प्रशिक्षण दिया जाता है। मेरा शोध जीयो-इफेक्टिवनेश आॅफ द एनर्जेटिक फिनामन आॅफ द सन पर था” ,उन्होंने एक इंटरव्यू में बताया।

गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर (GSFC) के हेलियोफिजिक्स विभाग (Heliophysics division) में चुने जाने का ई-मेल आशना को उनके विवाह के दिन प्राप्त हुआ। आखिरकार उनका सपना सच होने वाला था। उनके पति ने उनका हमेशा साथ दिया है। फ़ेलोशिप के लिए मात्र 10 दिनों में आशना को अपना शोध प्रस्ताव जमा करना था। कड़ी मेहनत से उन्होंने अंततः NASA के फ़ेलोशिप कार्यक्रम के तहत 7 लाख रुपये की राशी प्राप्त कर ली।

“मेरे छोटे से गांव में इसका जश्न मनाया गया और मेरे परिवार के लिए, इससे अधिक गर्व का पल और कुछ भी नहीं हो सकता था। लेकिन मेरी चिन्ता मेरी पहली उड़ान को लेकर थी”, उस वक्त को याद करते हुए कहा।

यह सब इतना आसान नहीं था। उसके सपने सच हो रहे थे मगर अब भी यह छोटे गांव की लड़की नई दुनिया में जाने को पूरी तरह तैयार नहीं थी। फिर भी इसने सभी चुनौतियों का सामना कर अपना रास्ता बनाया। उन्होंने सोलर रेडियो ब्रस्ट, एक्सप्लोड द आॅरगनैजेशन, आब्जर्वेशन एण्ड डिपार्टमेंट इत्यादि पर काम किया। उन्होंने वहां कार्यशालाओं में भाग लिया। वहां उन्होंने अंतरिक्षिय मौसम पर शोध कर से 50 देशों से अधिक वैज्ञानिकों के साथ विचार-विमर्श किए।

आशना एक अनुकरणीय उदाहरण हैं जिन्होंने यह साबित कर दिखाया है कि किस प्रकार जुनून व्यक्ति के लिए उसकी राह कायम करता है। उनका मानना है कि हरेक बच्चे को यह जानना चाहिए कि उनकी जो भी पृष्ठभूमि हो या उनके माता-पिता ग़रीब ही क्यों न हो या उन्होंने मलयालम माध्यम से पढ़ाई की हो या बहुत कुशाग्र न हो इसके बावजूद भी वे सब वहां पहुंच सकते हैं यदि उनका जुनून शक्तिशाली है।

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