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देश की पहली महिला स्वास्थ्य मंत्री जिसने AIIMS जैसे संस्थान की स्थापना में मुख्य भूमिका निभायी

भारत गवाह है एक लंबे समय तक चलने वाले ब्रिटिश रूल के खिलाफ स्वतंत्रता संग्राम का, जब हजारों की संख्या में पुरुष और महिलाओं ने स्वतंत्रता संग्राम के लिए अपना घर बार छोड़ दिया था। यह देश की पुकार थी और परिवर्तन की हवा इतनी मज़बूत थी कि देशभक्त अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार थे।

एक रानी जो पैदा हुई एक वैभवशाली राजा के परिवार में, और जिन्होंने हर सुविधा को त्याग कर देश की स्वतंत्रता के लिए लड़ाई लड़ी। कपूरथला की राजकुमारी अमृत कौर ने अपना सारा जीवन देश और देश के लोगों की सेवा के लिए बलिदान कर दिया।

राजकुमारी अमृत कौर राजा हरनाम सिंह की इकलौती पुत्री थीं। उनका जन्म 2 फरवरी 1889 को चंडीगढ़ में हुआ था। अपने पिता के अवध स्टेट लखनऊ में वह पली-बढ़ीं। 12 वर्ष की उम्र में राजकुमारी पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चली गई। अमृत ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से अपनी शिक्षा प्राप्त कर की। अमृत एक जुनूनी महिला थीं।

भारत लौटने के बाद स्वतंत्रता सेनानी गोपाल कृष्ण गोखले से वे खासा प्रभावित हुईं, जो उनके पिता के दोस्त थे। देश के लिए उनके लगन और प्यार से प्रभावित होकर अमृत ने यह तय किया कि वह भी स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेंगी। गोपाल कृष्ण गोखले की वजह से ही वे महात्मा गांधी से मिल पाईं और इस एक मुलाकात से उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। गांधी के विचारों और देश के प्रति उनके दृष्टिकोण का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। जलियांवाला बाग नरसंहार से वे बेहद दुखी थीं और उसके बाद उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेना शुरू कर दिया।

1926 में अमृत ने ऑल इंडिया वुमंस कांफ्रेंस की स्थापना की और देश की कुप्रथाओं जैसे बाल विवाह, पर्दा-प्रथा और देवदासी संस्कृति को हटाने के लिए कार्य किया। 1930 में जब उनके माता-पिता का देहांत हो गया तब उन्होंने महात्मा गांधी के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में खुलकर हिस्सा लेना शुरू कर दिया। उन्होंने अपने आलीशान महल को छोड़ दिया और 1936 में गांधी जी की सचिव बन गयीं जो स्वतंत्रता मिलने तक कायम रहीं।

अमृत गांधी जी के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी मार्च में शामिल हुईं। वह कभी भी विरोध करने और धरना देने से नहीं डरती थी। अपनी आलीशान जिंदगी को छोड़कर राजकुमारी एक बहादुर फ्रीडम फाइटर में परिवर्तित हो चुकी थीं, जो कभी भी लाठीचार्ज का मुकाबला करने से नहीं कतराती थीं।

गांधी जी की सच्ची अनुयायी, अमृत केवल स्वतंत्रता सेनानी ही नहीं, बल्कि एक समाज सेविका भी थीं। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों और बराबरी के अवसर के लिए लड़ाईयां भी लड़ीं । उन्हीं के प्रयासों से लड़कियों की शादी की उम्र 14 वर्ष से बढ़ाकर 18 वर्ष की गई थी। जब वे संविधान सभा की सदस्य नियुक्त हुईं तब उन्होंने यूनिफॉर्म सिविल कोड के लिए ज़ोर दिया।

वे समाज की बुराइयों, जैसे बहु विवाह प्रथा और महिलाओं को विरासत के अधिकार के लिए संविधान बनाना चाहती थीं। वह कभी भी महिला आरक्षण की समर्थक नहीं रहीं परंतु भारतीय राजनीति में महिलाओं के आरक्षण के लिए हमेशा सहायक रही।

 

भारत के स्वतंत्र होने पर उन्हें भारतीय कैबिनेट में स्थान मिला। उन्हें भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री नियुक्त किया गया। अमृत पहली महिला और पहली एशियन है, जिन्हें 1950 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की अध्यक्षा बनाया गया। वे भारतीय रेड क्रॉस सोसाइटी की 14 वर्ष तक चेयर परसन भी रहीं।

स्वतंत्र भारत में उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस की स्थापना है। 1964 में इसे पूरे विश्व में पहचान मिली। इसके अलावा उन्होंने भारत में ट्यूबरक्लोसिस एसोसिएशन, सेंट्रल लेप्रॅसी टीचिंग एंड रिसर्च इंस्टिट्यूट, अमृत कौर कॉलेज ऑफ़ नर्सिंग, लेडी इरविन कॉलेज और भारतीय राष्ट्रीय स्पोर्ट्स क्लब की भी शुरूआत की।

अमृत का जीवन एक आदर्श जीवन था। साधारण सी प्लेन साड़ी में लिपटी, अमृत ने कभी भी आलीशान जिंदगी की इच्छा नहीं की जबकि वे जन्मीं ही राजघराने में थी। उनके काम के प्रति जूनून और दृढ़ संकल्प ने ही उन्हें देश की स्वतंत्रता के आंदोलन में भागीदार बनाया।

उन्होंने एक अच्छी ज़िन्दगी जी और 75 साल की उम्र में जाकर उनका देहांत हुआ। अपनी अंतिम साँस तक भी वे काम के प्रति और दूसरों की ज़िन्दगी बेहतर बनाने के लिए दृढ़ संकल्पित थीं। वे सभी उम्र के लोगों के लिए प्रेरक व्यक्तित्व हैं। देश सेवा के क्षेत्र में राजकुमारी अमृत कौर का योगदान असाधारण है। विशाल साहस और शिष्टता के साथ राजकुमारी ने लोगों के दिलों में अपनी ख़ास जगह बनाई।

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