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एक शहीद की कहानी: जब गाँव में बलात्कार की घटनाएं आम हो चुकी थी, तब ये मसीहा बनकर उभरे

भारत में कभी भी महान सामाजिक कार्यकर्ताओं और समाज सुधारकों की कमी नहीं रही। हमारे इतिहास को अपने उन बहादुरों पर गर्व है, जिन्होंने भारत को ब्रिटिश शासन से आज़ाद करवाया। वहीं हमारे वर्तमान समाज सुधारकों ने अन्धविश्वास और सांप्रदायिक संघर्षों की अँधेरी गलियों से खींच कर हमें आत्मविश्वास और प्रगति के पथ पर ला खड़ा किया।

भारत के आधुनिक युग के समाज सुधारकों में एक नाम बरुन बिस्वास का है। वे पेशे से एक शिक्षक थे। गांव के आस-पास के लोग उन्हें उनकी बहादुरी और दयालुता की वजह से जानते थे। वे पूरी निष्ठा से न्याय पर विश्वास करते थे और अपराध को कभी भी बर्दाश्त नहीं करते। उन्होंने कुख्यात गैंग के द्वारा अपने गांव के साथ-साथ पश्चिम बंगाल के और भी बहुत से गांवों में हो रहे अत्याचारों के खिलाफ़ संघर्ष किया। 5 जुलाई 2012 को बरुन की वेस्ट बंगाल के गोबरडांगा रेलवे स्टेशन में हत्या कर दी गई।

बरुन का जन्म साल 1972 में पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव में हुआ था। 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के कारण उनके परिवार ने अपना घर छोड़ दिया। उनके पिता दिन में मजदूरी करते थे और रात में स्थानीय थिएटर में गाना गाते। उनका बचपन बेहद कठिन परिस्थितियों में बीता। उतार-चढ़ाव वाले दिनों ने उन्हें सरल स्वभाव का बना दिया क्योंकि वे गरीबी और संघर्ष के दर्द को अच्छी तरह से समझते थे।

बरुन एक लोकहितैषी के रूप में प्रसिद्ध थे। ज़रूरतमंद लोगों के लिए वे कुछ भी कर गुज़रने के लिए हमेशा तैयार रहते थे और अपनी हर चीज़ उन्हें दे दिया करते थे। एक बार तो उन्होंने अपने पड़ोसी को अपना बिस्तर तक दे दिया था और खुद प्लास्टिक की शीट बिछा कर सो गए।

उनके सुतीआ गांव और आस-पास के कुछ गांवों में सुशांत चौधरी के अपराधी गैंग का आतंक था। यह गैंग किसी का भी घर तोड़ देता, लोगों को बंधक बना लेता, घर लूट लेता और महिलाओं के साथ बलात्कार करता था। वे किसी भी उम्र की महिला के साथ बलात्कार करने में संकोच नहीं करते थे। सारे गांव के लोग उनसे डरे रहते थे परन्तु डर की वजह से उनके ख़िलाफ़ कोई भी आवाज़ नहीं उठाता।

आकड़ों के हिसाब से उनके ख़िलाफ़ 33 बलात्कार और 12 हत्या के केस थे परन्तु असल में मामलों की संख्या इससे भी अधिक है। पुलिस ने भी डर की वजह से चुप्पी साध ली थी और उदासीन हो गई थी।

एक शाम, गांव के कुछ लोग सुशांत और उसके गैंग के ख़िलाफ विरोध प्रदर्शन करने के लिए इकट्ठे हुए। परन्तु किसी में भी उनके खिलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। वे अपने सहयोगियों को फुसफुसा कर गुप्तरुप से पम्फ्लेट्स बाँटने को कह रहे थे। जब सभी ने गुंडों को चुनौती देने में अपनी असमर्थता जताई तब बरुन तेजी से स्टेज पर आये, हाथ में माइक पकड़ कर बोलना शुरू किया।

“अगर हम अपनी बहनों, बेटियों, पत्नियों और माताओं की सुरक्षा नहीं कर सकते तो हमें इस समाज में रहने का कोई हक़ नहीं है। अगर हममें बलात्कारियों से लड़ने की ताकत नहीं है तो हम बड़ी से बड़ी सज़ा के हक़दार हैं। इसलिए आइये और हमारी महिलाओं के सम्मान के लिए एकजुट होइये।”

और जैसे ही बरुन ने अपना भाषण ख़त्म किया, तालियों की तेज आवाज़ से पूरा गांव गूंज उठा। लोगों ने साहस बटोर कर डर के खिलाफ़ आवाज़ उठाने का निश्चय किया। और उसके बाद इस गैंग के दुर्भावनापूर्ण कारनामों के खिलाफ़ एक मजबूत संगठन बनाया गया।

बरुन का ग्रुप बलात्कार की शिकार महिलाओं के ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाने में मदद करता। वे उन्हें पुनर्वासित करते, उनकी काउंसिलिंग करते और दोबारा पुरानी स्थिति में खड़ा करने में मदद करते थे। वे पीड़ित महिलाओं को अपराधियों के खिलाफ़ रिपोर्ट लिखवाने के लिए भी प्रोत्साहित करते।

बरुन और उनके ग्रुप ने पुलिस पर भी दबाव डालकर सुशांत और उसके पांच साथियों को पकड़ने में मदद किया। जब सुशांत पकड़ा गया, बरुन ने रामकृष्ण की एक पुस्तक उसके हाथ में दी और कहा, “इसे जेल में पढ़ना।”

जेल जाने के बाद सुशांत ने अपनी पैनी नज़र बरुन पर रखना शुरू कर दिया। सलाखों के पीछे बैठकर वह बरुन को मारने की साजिश रचता रहा। उसने एक पेशेवर हत्यारे को इस काम के लिए रखा, जो बाद में पकड़ा गया।

बरुन ने जो सोचा वह कर दिखाया, परन्तु अपनी जान की कीमत पर। एक महान समाज सेवक की कमी ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया और उनकी मृत्यु की खबर जंगल में आग की तरह फैल गई। वे जानते थे कि लोग उन्हें मारने की योजना बना रहे हैं; परन्तु फिर भी वे बिना डरे अपने काम में लगे रहे।

बरुन की मां ने एक इंटरव्यू में कहा,“मैं वह गर्व से भरी मां हूँ जिसने अपना बेटा खोया है। बरुन मेरा सबसे छोटा बेटा था, यह जानते हुए भी कि उसके जान को ख़तरा है, उसने कभी अपने पैर पीछे नहीं किये।”

2013 में उनके जीवन, कार्यों और उपलब्धियों पर आधारित एक फिल्म बनाई गई। इस फिल्म का नाम ‘प्रलय’ था जिसका अर्थ तूफ़ान होता है। उन्होंने बहुत सारे लोगों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन को संभव बनाया और इसलिए इस फ़िल्म का यह नाम एकदम सटीक बैठता है।

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