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इस भारतीय ने एक ऐसे प्लास्टिक का आविष्कार किया, जिसे खाने पर भी कोई नुकसान नहीं

हमारे शहरों के बाहरी इलाके में दानवाकार कूड़ों के ढेर इतने आम हो गए हैं कि अब उनकी मौजूदगी से हमें कोई आश्चर्य या पीड़ा नहीं होती। आवारा कुत्ते, गायें और चिड़ियों के हुजूम इन कूड़े के ढेर से निकलते खाद्य पदार्थों की गंध से खिंचे चले आते हैं। उनमें से कितने दुर्घटनावश खाने की चीजों के साथ प्लास्टिक के टुकड़े भी खा जाते हैं और परिणाम स्वरूप उन्हें मिलती है भयावह और पीड़ादायक मौत। कभी आपने सोचा है कि सरकारों द्वारा प्लास्टिक पर लगाया गया बैन और उनके तमाम अभियानों, जिनमें प्रचार विज्ञापनों के द्वारा प्लास्टिक के विनाशकारी प्रभावों को बार-बार रेखांकित किया जाता है, के बाद भी प्लास्टिक के इस्तेमाल की प्रभावी रोकथाम अब तक संभव क्यों नहीं हो सकी है?

यदि हम विचार करें तो बहुत ही सहजता से हम यह महसूस कर सकेंगे कि जब तक हम प्लास्टिक का एक बेहतर विकल्प मानवता के सामने पेश नहीं कर सकेंगे यह समस्या यूं ही बनी रहेगी। मैंगलोर के रहने वाले 25 वर्षीय युवक अश्वत्थ हेगड़े ने अपने शहर में लगे प्लास्टिक बैन और उसके बाद लोगों को रोज़मर्रा की होने वाली असुविधाओं के बारे में सुना, उसने तय कर लिया कि उन्हें इस समस्या के लिए एक उम्दा हल ढूंढ निकालना है। अश्वत्थ हेगड़े, जो पेशे से एक बायो टेक इंजीनियर हैं, ने उन दो फ्रेंड्स शोधार्थियों से संपर्क साधा जो इस जैसे प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। उन दोनों के साथ मिलकर अश्वत्थ ने एक साझा कार्यक्रम तय किया जिसके तहत भारत का पहला ऑर्गेनिक प्लास्टिक बैग का निर्माण होना था।

अश्वत्थ के प्लास्टिक में आम प्लास्टिक की तरह ही आप अपने राशन की खरीददारी रखकर ले जा सकते हैं, उसे पानी में उबाल सकते हैं, जला सकते हैं और यहां तक कि उसे खा भी सकते हैं। ऑर्गेनिक प्लास्टिक का इस्तेमाल बिल्कुल आम प्लास्टिक की तरह ही संभव है, दोनों दिखते भी बिल्कुल एक जैसे हैं; तो फिर यह ऑर्गेनिक कैसे हुआ! और यदि यह ऑर्गेनिक है भी तो लोगों को यह विश्वास कैसे दिलाएं कि यह सचमुच ऑर्गेनिक है !

“इस बात को सिद्ध करने के लिए कि इन ऑर्गेनिक प्लास्टिक के कैरी बैग के इस्तेमाल से पर्यावरण को कोई खतरा नहीं है, अश्वत्थ को उस कैरी बैग को खा जाने से भी कोई परहेज नहीं है। वह उस बैग को पानी के गिलास में घोल कर पी जाने से भी नहीं हिचकते।”

आप पूछेंगे, कि अश्वत्थ को यह सब कर जाने का आत्मविश्वास कहां से मिलता है? वह जानते हैं कि उनका ऑर्गेनिक प्लास्टिक जिन घटकों से मिलकर बना है, वह पूरी तरह से प्राकृतिक हैं और उनके इस्तेमाल से किसी भी तरह के नुकसान की संभावनाएं बिल्कुल भी नहीं हैं। उनकी कंपनी एनवीग्रीन, इन कैरी बैग को बनाने के लिए शकरकंद, भुट्टे, गन्ने, टैपिओका के रेशों और वेजिटेबल वेस्ट का इस्तेमाल कच्चे माल के रूप में करती है। यहां तक कि उन्हें बनाने की प्रक्रिया में और प्रिंटिंग के लिए काम में लाए गए रंगों में भी सिर्फ नैसर्गिक पदार्थों का ही प्रयोग होता है।

यदि हमारा पूरा देश इन ऑर्गेनिक प्लास्टिक बैग का प्रयोग करना शुरू कर देता है तो कितने ही जानवरों को बेमौत मरने से बचाया जा सकता है। यह प्लास्टिक जलाने से बिना जहरीला धुआं पैदा किए ही राख में बदल जाता है, यदि पानी 80°C तक गर्म हो तो इसे घुलने में सिर्फ 15 सेकंड लगते हैं और तो और यदि इसे खुले में यूं ही छोड़ दिया जाए तो उसे सड़ने में सिर्फ 180 दिन लगते हैं।

हमेशा कपड़े के थैलों का इस्तेमाल हर किसी के लिए आसान नहीं होता क्योंकि इस तरह के एक बैग की कीमत 5 से 15 रुपयों तक हो सकती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए एन्वीग्रीन मैं इन प्लास्टिक बैग की कीमत सिर्फ ₹3 रखा है जो प्लास्टिक बैग कि कीमत से सिर्फ ₹1 ज्यादा है। एन्वीग्रीन अपना कच्चा माल सीधे किसानों से खरीदता है जिससे उन किसानों को आमदनी का एक अतिरिक्त जरिया भी भी मिल जाता है।

अश्वत्थ के इस अनोखे पर्यावरण हितैषी आविष्कार को कर्नाटक के राज्य प्रदूषण निवारण मंडल का अनुमोदन मिल चुका है, बोर्ड इसे गैर प्लास्टिक होने और सिर्फ स्टार्च के उप उत्पादों से बने होने का प्रमाण पत्र दे चुका है। अश्वत्थ ने अपने प्रोडक्ट और अपने आइडिया के प्रचार के लिए एक ऑनलाइन अभियान भी छेड़ा हुआ है और उसे जिस तरह की प्रतिक्रिया मिल रही है वह बेहद उत्साहवर्धक है।

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